Durga Visarjan: नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करने के बाद भक्त नम आंखों से माता को विदाई देते हैं। दुर्गा पूजा के दौरान स्थापित की गई प्रतिमाओं का विसर्जन दशमी के दिन या परंपरा के अनुसार निर्धारित समय पर किया जाता है। इस दौरान भक्त मां दुर्गा की प्रतिमा को जल में प्रवाहित करते हैं और अगले वर्ष फिर से उनके आगमन की कामना करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन जल में ही क्यों किया जाता है? इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है और जल को इस परंपरा से क्यों जोड़ा गया है? आइए जानते हैं मां दुर्गा की प्रतिमा के जल विसर्जन का धार्मिक महत्व।
जल में विसर्जन की परंपरा
हिंदू धर्म में जल को अत्यंत पवित्र माना गया है। नदियों, सरोवरों और अन्य पवित्र जल स्रोतों का धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष महत्व है। पूजा-पाठ से लेकर देव प्रतिमाओं के विसर्जन तक, जल को शुद्धि और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। मां दुर्गा की प्रतिमा का जल में विसर्जन भी इसी धार्मिक भावना से जुड़ा है। भक्तों की मान्यता है कि प्रतिमा के विसर्जन के साथ पूजा का एक चरण पूरा होता है और माता को श्रद्धापूर्वक विदाई दी जाती है।
पंचतत्व से जुड़ा है प्रतिमा विसर्जन
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, संसार की प्रत्येक वस्तु पंचतत्व यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बनी है। मनुष्य का शरीर हो या मिट्टी से बनी प्रतिमा, सभी का संबंध प्रकृति के इन्हीं तत्वों से माना जाता है। मां दुर्गा की प्रतिमा सामान्यतः मिट्टी से बनाई जाती है। पूजा के बाद उसका जल में विसर्जन इस धार्मिक विचार को दर्शाता है कि प्रकृति से प्राप्त वस्तु अंततः प्रकृति में ही समाहित हो जाती है। इस तरह विसर्जन सृष्टि के निर्माण और उसके प्रकृति में लौटने की भावना से भी जुड़ा हुआ है।
मिट्टी की प्रतिमा का क्या है महत्व?
परंपरागत रूप से दुर्गा पूजा की प्रतिमाएं मिट्टी से तैयार की जाती हैं। मिट्टी को धरती का प्रतीक माना जाता है और इससे बनी प्रतिमा में भक्त मां दुर्गा के स्वरूप का पूजन करते हैं। पूजा के दौरान प्रतिमा केवल मिट्टी की आकृति नहीं रहती, बल्कि भक्तों की आस्था और श्रद्धा का केंद्र बन जाती है। विसर्जन के समय मिट्टी का जल में मिलना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि जिस प्राकृतिक तत्व से प्रतिमा बनी थी, वह उसी प्रकृति में वापस समा रही है। हालांकि, पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए आज मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनी प्रतिमाओं को प्राथमिकता देने की सलाह दी जाती है।
मां को विदाई देने की परंपरा
दुर्गा प्रतिमा विसर्जन को केवल प्रतिमा को जल में प्रवाहित करने की प्रक्रिया नहीं माना जाता, बल्कि यह मां दुर्गा को भावपूर्ण विदाई देने का अवसर भी है। नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दौरान भक्त माता की आराधना करते हैं, उनसे सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं। विसर्जन के समय भक्त अगले वर्ष फिर से माता के आगमन की कामना करते हैं। बंगाल सहित कई क्षेत्रों में दुर्गा पूजा के अंतिम दिन सिंदूर खेला, आरती और विदाई की विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं। इन रस्मों के माध्यम से भक्त मां दुर्गा के प्रति अपना प्रेम और सम्मान प्रकट करते हैं।
जल को क्यों माना जाता है पवित्र?