Navratri 2025 Day 2 Puja: नवरात्रि का त्यौहार, जिसे "नौ रातें" भी कहा जाता है, देवी दुर्गा और उनके विभिन्न अवतारों का सम्मान करता है।
Navratri 2025 Day 2 Puja: नवरात्रि का त्यौहार, जिसे "नौ रातें" भी कहा जाता है, देवी दुर्गा और उनके विभिन्न अवतारों का सम्मान करता है। 2025 में नवरात्रि के दूसरे दिन, समर्पण, प्रतिबद्धता, ज्ञान और शुद्धता की देवी माँ ब्रह्मचारिणी को नमन करने का अनुष्ठान है। भक्त उनसे शक्ति, ज्ञान और धैर्य की कामना करते हैं, क्योंकि वह कुछ दिव्य प्राप्त करने के लिए तपस्या की शक्ति का प्रतीक हैं। इस लेख में, नवरात्रि के दूसरे दिन के माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप, पूजा विधि, बीज मंत्र, कथा के बारे में बताया गाया है
माँ ब्रह्मचारिणी का महत्व
माँ ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा का दूसरा अवतार हैं, जो आध्यात्मिकता और दृढ़ता का प्रतीक हैं। उन्हें एक शांत देवी के रूप में दर्शाया गया है जो एक माला (जप माला) और एक जल पात्र (कमंडल) धारण करती हैं, जो उनके कठोर, धार्मिक जीवन का प्रतिनिधित्व करता है। अपनी भक्ति के माध्यम से, उन्होंने भगवान शिव की कृपा प्राप्त की, जो सच्ची भक्ति का प्रतीक बन गईं।
नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से भक्तों के दिलों में इच्छाशक्ति, एकाग्रता और गहन भक्ति का विकास होता है। इससे उन्हें शांति, समृद्धि और धीरज के लिए प्रार्थना करने का मौका मिलता है, जिससे उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना शालीनता और शक्ति के साथ करने में मदद मिलती है।
मां ब्रह्मचारिणी पूजा 2025 मुहूर्त और शुभ योग (Maa Brahmacharini Puja muhurat 2025)
अभिजित मुहूर्त
12:01 पी एम से 12:50 पी एम
अमृत काल
07:24 ए एम से 08:48 ए एम
रवि योग
01:45 पी एम से 02:08 पी एम
विजय मुहूर्त
02:30 पी एम से 03:19 पी एम
गोधूलि मुहूर्त
06:37 पी एम से 07:00 पी एम
सायाह्न सन्ध्या
06:38 पी एम से 07:48 पी एम
निशिता मुहूर्त
12:02 ए एम, अप्रैल 01 से 12:48 ए एम, अप्रैल 01
ब्रह्म मुहूर्त
04:40 ए एम से 05:26 ए एम
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप
मां ब्रह्मचारिणी को ब्राह्मी भी कहा जाता है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी का अर्थ है तप का आचरण करने वाली, यानी तप का आचरण करने वाली शक्ति। देवी के दाएं हाथ में जपमाला और बाएं हाथ में कमंडल है। देवी ने भगवान शंकर को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, जिसके कारण उन्हें मां ब्रह्मचारिणी कहा गया।
मां ब्रह्मचारिणी पूजा विधि
- मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में अधिकतर लाल रंग का प्रयोग करें। स्नान के बाद लाल वस्त्र पहनें।
- जहां कलश स्थापित किया गया है या पूजा स्थल पर मां दुर्गा की मूर्ति के सामने घी का दीपक जलाएं और मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान करें और उन्हें रोली, अक्षत, हल्दी चढ़ाएं।
- पूजा में देवी को लाल फूल चढ़ाएं। मां को चीनी और पंचमत्री का भोग लगाएं। फलों में सेब अवश्य रखें। अगरबत्ती जलाएं और देवी बीज मंत्र का 108 बार जाप करें
- नवरात्रि के दौरान प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है। अंत में कपूर से देवी ब्रह्मचारिणी की आरती करें।
माँ ब्रह्मचारिणी बीज मंत्र
ह्रीं श्री अम्बिकायै नमः।
माँ ब्रह्मचारिणी प्रार्थना मंत्र
दधाना कपाभ्यामक्षमालाकमंडलु।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।
माँ ब्रह्मचारिणी पूजा मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
माँ ब्रह्मचारिणी पूजा रंग
देवी ब्रह्मचारिणी को चीनी और पंचामृत प्रिय है। इसे देवी को अर्पित करने से लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए लाल रंग शुभ माना जाता है।
मां ब्रह्मचारिणी का पसंदीदा फूल
देवी को बरगद के पेड़ का फूल पसंद है। इसका रंग लाल होता है।
मां ब्रह्मचारिणी पूजा के लाभ
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति की शक्ति, संयम, त्याग की भावना और वैराग्य बढ़ता है।
देवी संकट के समय भक्त को शक्ति प्रदान करती हैं। तपस्या से देवी ने अपार शक्ति प्राप्त की थी, इसी शक्ति से देवी ने राक्षसों का वध किया था। मां के आशीर्वाद से भक्त को अद्भुत शक्ति प्राप्त होती है जिससे शत्रु का सामना करने की शक्ति मिलती है।
आत्मविश्वास और स्मरण शक्ति बढ़ती है। देवी के प्रभाव से व्यक्ति का मन भटकता नहीं है।
मां ब्रह्मचारिणी कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी ने शिव को पति रूप में पाने के लिए एक हजार वर्षों तक फल-फूल खाए और सौ वर्षों तक जमीन पर रहकर शाक खाकर जीवन यापन किया। उन्होंने सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम को सहन किया, लेकिन देवी अपनी तपस्या में अडिग रहीं। वे टूटे हुए बिल्व पत्र खाकर शिव की भक्ति में लीन रहीं। जब भोले नाथ उनकी कठोर तपस्या से भी प्रसन्न नहीं हुए तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिया। महादेव को पाने के लिए वे हजारों वर्षों तक बिना जल और अन्न के रहकर तपस्या करती रहीं। माता की कठोर तपस्या को देखकर सभी देवताओं और ऋषियों ने उनकी मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद दिया। इस कथा का सार यह है कि अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कठिन समय में भी मन को विचलित नहीं करना चाहिए, तभी सफलता प्राप्त होती है।