Ramayana: भारतीय सनातन परंपरा में रामायण केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के दिव्य चरित्र का प्रामाणिक ग्रंथ मानी जाती है। इस महाग्रंथ की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की थी, जिन्हें आदिकवि के रूप में भी जाना जाता है। किंतु यह प्रश्न अक्सर उठता है कि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना क्यों की थी और उन्हें इस महान काव्य को लिखने की प्रेरणा कैसे प्राप्त हुई? पौराणिक कथाओं के अनुसार इसके पीछे एक अत्यंत मार्मिक घटना, देवर्षि नारद का मार्गदर्शन और स्वयं ब्रह्माजी का आशीर्वाद जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि रामायण को केवल एक काव्य नहीं, बल्कि दिव्य प्रेरणा से उत्पन्न महाग्रंथ माना जाता है।
महर्षि वाल्मीकि कौन थे?
पुराणों और रामायण की परंपरागत कथाओं के अनुसार महर्षि वाल्मीकि का पूर्व नाम रत्नाकर था। वे प्रारंभिक जीवन में वन में रहने वाले एक शिकारी और लुटेरे के रूप में जीवन व्यतीत करते थे। किंतु नारद मुनि के उपदेश और भगवान के नाम के जप से उनके जीवन में गहरा परिवर्तन आया। कठोर तपस्या के पश्चात वे महान ऋषि बने और आगे चलकर वेद-वेदांगों के ज्ञाता तथा आदिकवि कहलाए। इसी कारण उन्हें संस्कृत साहित्य का प्रथम कवि भी माना जाता है, क्योंकि उनके मुख से निकला प्रथम श्लोक ही आगे चलकर काव्य परंपरा का आधार बना।
देवर्षि नारद से हुआ अद्भुत संवाद
वाल्मीकि रामायण के बालकांड में वर्णित कथा के अनुसार एक बार महर्षि वाल्मीकि के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि इस संसार में ऐसा कौन पुरुष है, जिसमें सभी श्रेष्ठ गुण एक साथ विद्यमान हों। वे जानना चाहते थे कि कौन सत्यवादी, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, वीर, दृढ़प्रतिज्ञ और लोककल्याणकारी है।
उसी समय उनके आश्रम में देवर्षि नारद पधारे। महर्षि वाल्मीकि ने उनसे पूछा- “हे मुनिवर! इस पृथ्वी पर ऐसा कौन पुरुष है जो गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ और सत्य का पालन करने वाला हो?” देवर्षि नारद ने उत्तर में अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम का वर्णन किया। उन्होंने श्रीराम के जन्म से लेकर वनवास, रावण-वध और राज्याभिषेक तक के समस्त जीवन का संक्षिप्त वर्णन किया।
कहा जाता है कि श्रीराम के दिव्य चरित्र को सुनकर महर्षि वाल्मीकि अत्यंत प्रभावित हुए। उनके मन में भगवान राम के जीवन को विस्तार से लोक में स्थापित करने का विचार उत्पन्न हुआ। यही रामायण रचना की प्रारंभिक प्रेरणा मानी जाती है।
तमसा नदी के तट पर घटी मार्मिक घटना
देवर्षि नारद से संवाद के कुछ समय बाद महर्षि वाल्मीकि अपने शिष्यों के साथ तमसा नदी के तट पर गए। वहां उन्होंने एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को प्रेमपूर्वक विचरण करते देखा। उसी समय एक शिकारी ने अचानक नर क्रौंच पक्षी पर बाण चला दिया। बाण लगते ही पक्षी भूमि पर गिर पड़ा और उसकी संगिनी करुण स्वर में विलाप करने लगी। उस पक्षी का दुःख देखकर महर्षि वाल्मीकि के हृदय में गहरी करुणा जाग उठी। उसी भावावेश में उनके मुख से स्वतः एक श्लोक निकला-
“मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥”
अर्थात्- हे निषाद! तूने काममोहित क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से एक की हत्या की है, इसलिए तुझे कभी स्थायी प्रतिष्ठा प्राप्त न हो।
पौराणिक मान्यता है कि यह संसार का प्रथम श्लोक था। इसी कारण महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि कहा गया और इसी क्षण संस्कृत काव्य की शुरुआत मानी गई।
प्रथम श्लोक से कैसे आरंभ हुई काव्य रचना?
श्लोक निकलने के बाद स्वयं महर्षि वाल्मीकि भी आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने अनुभव किया कि उनके मुख से निकले शब्द विशेष छंद और लय में व्यवस्थित थे। जब वे आश्रम लौटे तो उनके मन में यही विचार चलता रहा कि यह वाणी किस प्रकार प्रकट हुई। तभी एक दिव्य घटना घटी जिसने आगे चलकर रामायण की रचना का मार्ग प्रशस्त किया।
ब्रह्माजी ने दिया रामायण लिखने का आदेश
वाल्मीकि रामायण की कथा के अनुसार महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी प्रकट हुए। महर्षि ने उनका विधिपूर्वक स्वागत किया। ब्रह्माजी ने उनसे कहा कि उनके मुख से निकला श्लोक ईश्वरीय प्रेरणा से प्रकट हुआ है। उन्होंने महर्षि को भगवान श्रीराम के संपूर्ण जीवन का काव्य रूप में वर्णन करने का आदेश दिया।
ब्रह्माजी ने यह भी वरदान दिया कि योगबल से वे श्रीराम के जीवन की प्रत्येक घटना को प्रत्यक्ष रूप से देख सकेंगे, चाहे वह घटना प्रकट हो या गुप्त। पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्माजी ने कहा कि जब तक इस पृथ्वी पर पर्वत और नदियां रहेंगी, तब तक रामायण का यश संसार में बना रहेगा।
योगदृष्टि से देखा श्रीराम का संपूर्ण चरित्र
ब्रह्माजी के वरदान के पश्चात महर्षि वाल्मीकि ने योगबल से भगवान श्रीराम के जीवन की समस्त घटनाओं का दर्शन किया। उन्होंने अयोध्या में श्रीराम के जन्म, गुरु आश्रम में शिक्षा, सीता स्वयंवर, वनवास, पंचवटी, सीता हरण, सुग्रीव से मैत्री, लंका विजय और अयोध्या वापसी तक की घटनाओं को दिव्य दृष्टि से जाना।
इसी आधार पर उन्होंने रामायण की रचना की। परंपरागत मान्यता के अनुसार इस महाकाव्य में लगभग 24 हजार श्लोक हैं और इसे सात कांडों में विभाजित किया गया है-
1. बालकांड
2. अयोध्याकांड
3. अरण्यकांड
4. किष्किंधाकांड
5. सुंदरकांड
6. युद्धकांड
7. उत्तरकांड
इन सातों कांडों में भगवान श्रीराम के संपूर्ण जीवन और उनसे जुड़े प्रसंगों का विस्तार से वर्णन मिलता है।
लव-कुश को सबसे पहले सुनाई गई रामायण