Ramayana Katha: रामायण के सुंदरकांड में माता सीता की खोज से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण प्रसंगों का वर्णन मिलता है। इनमें से एक प्रसंग लंका की रक्षिका लंकिनी और भगवान राम के परम भक्त हनुमान जी की भेंट का है। जब हनुमान जी समुद्र पार कर माता सीता की खोज में लंका पहुंचे, तब सबसे पहले उनका सामना लंका के द्वार की रक्षा करने वाली लंकिनी से हुआ था। यह केवल एक साधारण भेंट नहीं थी, बल्कि वह घटना थी जिसने आगे चलकर रावण की लंका के भविष्य का संकेत भी दे दिया था।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लंकिनी लंका की अधिष्ठात्री रक्षिका थी। उसका दायित्व लंका के मुख्य प्रवेश द्वार की रक्षा करना था। कहा जाता है कि उसके रहते कोई भी अनजान व्यक्ति या शत्रु लंका में प्रवेश नहीं कर सकता था। यही कारण था कि जब हनुमान जी गुप्त रूप से लंका में प्रवेश करने पहुंचे, तब सबसे पहले उनका सामना लंकिनी से ही हुआ।
लंकिनी कौन थी?
रामायण में लंकिनी का वर्णन लंका की रक्षिका के रूप में मिलता है। वह रावण की सेना की साधारण राक्षसी नहीं थी, बल्कि पूरी लंका की सुरक्षा का दायित्व उसके हाथों में था। लंका के मुख्य द्वार पर उसका पहरा रहता था और वह आने-जाने वालों पर नजर रखती थी।
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब रावण ने अपने पराक्रम से लंका को समृद्ध और शक्तिशाली बना लिया था, तब उसकी सुरक्षा व्यवस्था भी अत्यंत मजबूत थी। लंकिनी उसी सुरक्षा व्यवस्था का प्रमुख हिस्सा थी। उसे लंका की अधिष्ठात्री देवी के समान भी माना जाता है, जो नगर की रक्षा के लिए नियुक्त थी।
जब सीता की खोज में लंका पहुंचे हनुमान
माता सीता का हरण करने के बाद रावण उन्हें लंका ले गया था। सीता माता की खोज के लिए भगवान राम ने वानर सेना को विभिन्न दिशाओं में भेजा। दक्षिण दिशा में गए दल में हनुमान जी भी शामिल थे। समुद्र तट पर पहुंचने के बाद जब जाम्बवान ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया, तब उन्होंने विशाल रूप धारण किया और एक ही छलांग में समुद्र पार करने का संकल्प लिया। मार्ग में कई बाधाएं आईं, लेकिन सभी को पार करते हुए हनुमान जी अंततः लंका के तट पर पहुंच गए।
लंका पहुंचने के बाद उन्होंने देखा कि पूरी नगरी अत्यंत भव्य और सुरक्षित थी। चारों ओर ऊंचे परकोटे, विशाल द्वार और कड़े पहरे की व्यवस्था थी। हनुमान जी जानते थे कि यदि वे अपने वास्तविक स्वरूप में नगर में प्रवेश करेंगे तो राक्षस उन्हें पहचान सकते हैं, इसलिए उन्होंने सूक्ष्म रूप धारण करने का निश्चय किया। रात्रि का समय होने पर उन्होंने अपना आकार छोटा कर लिया और लंका में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार की ओर बढ़े।
हनुमान और लंकिनी की पहली भेंट
जैसे ही हनुमान जी लंका के द्वार से भीतर प्रवेश करने लगे, तभी वहां पहरा दे रही लंकिनी की नजर उन पर पड़ गई। यद्यपि हनुमान जी सूक्ष्म रूप में थे, फिर भी लंकिनी ने उनकी उपस्थिति को महसूस कर लिया। उसने तुरंत उनका मार्ग रोक लिया और कठोर स्वर में कहा- “हे वानर! तुम कौन हो? किस उद्देश्य से लंका में प्रवेश करना चाहते हो? सत्य-सत्य बताओ। मेरे रहते कोई भी व्यक्ति बिना अनुमति इस नगर में प्रवेश नहीं कर सकता।”
लंकिनी के स्वर में अधिकार और कठोरता दोनों थे। वह अपने कर्तव्य का पालन कर रही थी और किसी भी अनजान व्यक्ति को नगर में प्रवेश नहीं करने देना चाहती थी। हनुमान जी ने शांत भाव से उत्तर दिया- “मैं इस सुंदर नगरी को देखने की इच्छा से यहां आया हूं। इसकी शोभा का दर्शन कर वापस लौट जाऊंगा। तुम मुझे मार्ग दे दो।” लेकिन लंकिनी को यह उत्तर स्वीकार नहीं हुआ। उसे संदेह हो गया कि यह कोई साधारण वानर नहीं है।
लंकिनी और हनुमान जी के बीच का संवाद
हनुमान जी की बात सुनकर लंकिनी ने कहा- “वानर! मैं लंका की रक्षिका हूं। मेरी अनुमति के बिना कोई भी इस नगरी में प्रवेश नहीं कर सकता। यदि तुम भीतर जाना चाहते हो तो पहले मुझे पराजित करना होगा।” हनुमान जी समझ गए कि बिना संघर्ष के आगे बढ़ना संभव नहीं है। उन्होंने पुनः विनम्रता से मार्ग देने का आग्रह किया, लेकिन लंकिनी अपने निर्णय पर अडिग रही। वह बोली- “जब तक मैं यहां उपस्थित हूं, कोई भी गुप्त रूप से लंका में प्रवेश नहीं कर सकता। यदि तुममें सामर्थ्य है तो पहले मुझे परास्त करो।” इसके बाद उसने हनुमान जी को रोकने का प्रयास किया और उन पर आक्रमण कर दिया।
लंकिनी पर हनुमान जी का प्रहार
लंकिनी के आक्रमण के बाद हनुमान जी ने विचार किया कि उनका उद्देश्य युद्ध करना नहीं, बल्कि माता सीता की खोज करना है। फिर भी मार्ग में बाधा बन रही लंकिनी को हटाना आवश्यक था। कहा जाता है कि हनुमान जी ने पूरी शक्ति का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने केवल अपनी बाईं मुट्ठी से हल्का सा प्रहार किया। लेकिन वह प्रहार इतना प्रभावशाली था कि लंकिनी तुरंत भूमि पर गिर पड़ी। उसके मुख से रक्त निकलने लगा और उसका गर्व चूर हो गया। जिस रक्षिका को अपनी शक्ति पर अत्यधिक विश्वास था, वह एक ही प्रहार में परास्त हो चुकी थी।
ब्रह्मा के वरदान का हुआ स्मरण
भूमि पर गिरते ही लंकिनी को एक पुरानी भविष्यवाणी याद आ गई। पौराणिक कथा के अनुसार पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने उसे लंका की रक्षा का दायित्व सौंपते समय एक महत्वपूर्ण बात कही थी। ब्रह्माजी ने कहा था- “जब किसी दिन एक वानर तुम्हें पराजित कर देगा, तब समझ लेना कि लंका के विनाश का समय निकट आ गया है।”
हनुमान जी के प्रहार के बाद लंकिनी को तुरंत ब्रह्मा के यही वचन स्मरण हो आए। वह समझ गई कि यह कोई साधारण वानर नहीं, बल्कि किसी दिव्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए आया हुआ महापुरुष है। उसे यह भी आभास हो गया कि अब रावण के अत्याचारों का अंत निकट है।
हनुमान जी से क्या बोली लंकिनी?
ब्रह्मा के वचनों को स्मरण करने के बाद लंकिनी का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। वह उठी और विनम्र भाव से हनुमान जी के सामने खड़ी हो गई। उसने कहा- “हे वीर वानर! अब मैं आपको पहचान गई हूं। आज ब्रह्मा के वचन सत्य सिद्ध हो गए हैं। आपने मुझे परास्त कर दिया है, इसका अर्थ है कि लंका पर संकट का समय आ पहुंचा है।”
इसके बाद उसने हनुमान जी को प्रणाम किया और कहा- “आप अवश्य ही किसी महान कार्य के लिए यहां आए हैं। आपका उद्देश्य सफल होगा। आप निश्चिंत होकर लंका में प्रवेश करें और जिस कार्य के लिए आए हैं, उसे पूर्ण करें।” कहा जाता है कि लंकिनी ने माता सीता की खोज में सफलता के लिए भी हनुमान जी को शुभकामनाएं दी थीं।
लंका में प्रवेश कर आगे बढ़े हनुमान