Mahabharata Mythological Story: कुरुक्षेत्र का महायुद्ध भारतीय इतिहास और पौराणिक परंपरा की सबसे महान घटनाओं में से एक माना जाता है। यह युद्ध केवल कौरवों और पांडवों के बीच राज्य प्राप्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच निर्णायक युद्ध भी माना गया। अठारह दिनों तक चले इस भीषण युद्ध में लाखों योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए और कुरुवंश लगभग समाप्त हो गया। युद्ध समाप्त होने के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि अब हस्तिनापुर के सिंहासन पर कौन बैठेगा और विशाल कुरु साम्राज्य का शासन कौन संभालेगा।
महाभारत की पौराणिक कथा के अनुसार, युद्ध में कौरवों के विनाश और दुर्योधन की मृत्यु के बाद हस्तिनापुर का राज्य पांडवों को प्राप्त हुआ। इसके पश्चात धर्मराज युधिष्ठिर का राजतिलक हुआ और वे हस्तिनापुर के राजा बने। हालांकि आगे चलकर उनके पौत्र परीक्षित ने भी हस्तिनापुर पर शासन किया। आइए जानते हैं कि महाभारत युद्ध के बाद की पौराणिक कथा...
उजड़ चुका था कुरुवंश
महाभारत के युद्ध में कौरवों के सभी सौ भाई मारे गए थे। भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कर्ण, शकुनि, जयद्रथ और अनेक महान योद्धा युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए। दूसरी ओर पांडव पक्ष से भी अनेक वीर योद्धाओं का अंत हो गया था। युद्ध के अंतिम चरण में जब भीम ने गदा युद्ध में दुर्योधन को परास्त किया, तब कौरव पक्ष का अंत निश्चित हो गया। दुर्योधन की मृत्यु के साथ ही हस्तिनापुर के सिंहासन पर कौरवों का अधिकार समाप्त हो गया। धृतराष्ट्र वृद्ध हो चुके थे और अपने पुत्रों के वियोग से अत्यंत दुखी थे। ऐसे में राज्य संचालन का दायित्व पांडवों पर आ गया।
युधिष्ठिर नहीं चाहते थे राज्य
महाभारत की कथा में वर्णन मिलता है कि युद्ध समाप्त होने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर अत्यंत दुखी थे। उन्होंने युद्धभूमि में अपने संबंधियों, गुरुजनों और परिजनों का विनाश देखा था। इस कारण उनके मन में गहरा वैराग्य उत्पन्न हो गया था। युधिष्ठिर स्वयं को इस विनाश का कारण मान रहे थे। उनका मानना था कि राज्य प्राप्ति के लिए इतना बड़ा रक्तपात हुआ, इसलिए वे राजसिंहासन स्वीकार करने के इच्छुक नहीं थे। उन्होंने राज्य त्यागकर वन में जाने का विचार भी किया। ऐसे समय में भगवान श्रीकृष्ण, महर्षि व्यास और अन्य ऋषियों ने उन्हें समझाया कि एक राजा का धर्म प्रजा का पालन करना होता है। यदि वे राज्य नहीं संभालेंगे तो हस्तिनापुर में अराजकता फैल सकती है। धर्म की स्थापना के लिए उनका राजा बनना आवश्यक था।
हस्तिनापुर के राजा बने धर्मराज युधिष्ठिर
महाभारत के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा और महर्षियों के उपदेश के बाद युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर का शासन संभालने का निर्णय लिया। इसके बाद विधिपूर्वक उनका राजतिलक किया गया। युधिष्ठिर के राजतिलक समारोह में अनेक ऋषि-मुनि और श्रेष्ठ पुरुष उपस्थित थे। पांडवों के ज्येष्ठ होने के कारण वे स्वाभाविक रूप से सिंहासन के अधिकारी थे। धर्म का पालन करने के कारण उन्हें धर्मराज कहा जाता था।
राजा बनने के बाद युधिष्ठिर ने न्याय, धर्म और सत्य के आधार पर शासन किया। उनके शासनकाल में प्रजा सुखी और समृद्ध बताई जाती है। कहा जाता है कि उनके राज्य में किसी प्रकार का अन्याय नहीं था और लोग शांति से जीवन व्यतीत करते थे।
धृतराष्ट्र और गांधारी का सम्मान
राजा बनने के बाद भी युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र और गांधारी का अत्यंत सम्मान किया। धृतराष्ट्र कौरवों के पिता थे और युद्ध में उनके पुत्र पांडवों के विरोधी थे, फिर भी युधिष्ठिर ने उन्हें पिता के समान आदर दिया। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि धृतराष्ट्र कुछ समय तक हस्तिनापुर में ही रहे। पांडवों ने उनकी सेवा में कोई कमी नहीं रखी। गांधारी को भी राजमाता के समान सम्मान दिया गया। बाद में धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती वनप्रस्थ आश्रम के लिए वन चले गए, जहां उन्होंने तपस्या का मार्ग अपनाया।
भीष्म पितामह से प्राप्त किया राजधर्म का ज्ञान
महायुद्ध के बाद भीष्म पितामह शरशय्या पर लेटे हुए थे। वे इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त होने के कारण अपने प्राण त्यागने की प्रतीक्षा कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को लेकर भीष्म पितामह के पास गए। वहां भीष्म ने उन्हें राजधर्म, दंडनीति, मोक्षधर्म और शासन व्यवस्था का विस्तृत ज्ञान दिया। महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व में इन शिक्षाओं का विस्तार से वर्णन मिलता है। इन उपदेशों के आधार पर युधिष्ठिर ने राज्य संचालन किया और धर्मसम्मत शासन स्थापित किया।
अश्वमेध यज्ञ का आयोजन
राजा बनने के बाद युधिष्ठिर ने राज्य की स्थिरता और धर्म स्थापना के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ का उद्देश्य समस्त दिशाओं में राज्य की सार्वभौमिक सत्ता स्थापित करना था। अर्जुन अश्वमेध के अश्व के साथ विभिन्न राज्यों में गए और अनेक राजाओं ने युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार की। इस प्रकार महाभारत युद्ध के बाद कुरु साम्राज्य पुनः संगठित हुआ। युधिष्ठिर का शासनकाल धर्म और न्याय पर आधारित माना जाता है। इसी कारण उनके शासन को आदर्श राजधर्म का उदाहरण माना गया है।
कब समाप्त हुआ युधिष्ठिर का शासन?
महाभारत की कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी से अपना अवतार समाप्त किया और द्वारका का अंत हुआ, तब पांडवों ने भी सांसारिक जीवन त्यागने का निश्चय किया। युधिष्ठिर ने राज्य अपने पौत्र परीक्षित को सौंप दिया। इसके बाद पांचों पांडव और द्रौपदी महाप्रस्थान के लिए हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए। इस प्रकार हस्तिनापुर के सिंहासन पर अगला उत्तराधिकारी परीक्षित बने।
परीक्षित कैसे बने हस्तिनापुर के राजा?