Mahabharata Mythological Story: महाभारत का द्यूत क्रीड़ा प्रसंग भारतीय इतिहास और पुराणों के सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक माना जाता है। यही वह घटना थी जिसने आगे चलकर कौरवों और पांडवों के बीच वैर को चरम पर पहुंचाया और अंततः महाभारत युद्ध की भूमिका तैयार की। अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि धर्मराज युधिष्ठिर, जो सत्य, धर्म और मर्यादा के पालन के लिए प्रसिद्ध थे, आखिर द्यूत क्रीड़ा जैसे विवादास्पद खेल के लिए क्यों तैयार हो गए थे। महाभारत की पौराणिक कथा में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है।
राजसूय यज्ञ के बाद बढ़ी दुर्योधन की ईर्ष्या
इंद्रप्रस्थ में पांडवों ने अपने पराक्रम और पुरुषार्थ से एक समृद्ध राज्य स्थापित किया था। भगवान श्रीकृष्ण की सहायता से युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ संपन्न किया, जिसमें अनेक राजाओं ने उनकी सार्वभौम सत्ता को स्वीकार किया। राजसूय यज्ञ के अवसर पर हस्तिनापुर से दुर्योधन भी आया था।
यज्ञ के बाद जब वह मयदानव द्वारा निर्मित भव्य सभा भवन में गया, तब वहां की अद्भुत संरचना देखकर वह भ्रमित हो गया। कहीं जल दिखाई देता था लेकिन भूमि होती थी और कहीं भूमि दिखाई देती थी लेकिन जल होता था। इसी भ्रम में दुर्योधन कई बार उपहास का पात्र बना। इस घटना ने उसके मन में पांडवों के प्रति ईर्ष्या और द्वेष को और अधिक बढ़ा दिया। हस्तिनापुर लौटने के बाद वह निरंतर इसी चिंता में डूबा रहा कि पांडवों की बढ़ती शक्ति और वैभव को कैसे समाप्त किया जाए।
शकुनि ने सुझाया द्यूत क्रीड़ा का उपाय
दुर्योधन की व्याकुलता देखकर उसके मामा शकुनि ने उससे कारण पूछा। दुर्योधन ने पांडवों की समृद्धि और अपने अपमान की बात बताई। तब शकुनि ने उसे आश्वासन दिया कि युद्ध के बिना भी पांडवों से उनका सब कुछ छीना जा सकता है। महाभारत के अनुसार शकुनि द्यूत क्रीड़ा में अत्यंत निपुण था। उसके पास ऐसे पासे थे जो उसकी इच्छा के अनुसार परिणाम देते थे।
उसने दुर्योधन से कहा कि यदि युधिष्ठिर को द्यूत क्रीड़ा के लिए आमंत्रित किया जाए तो वह उन्हें पराजित कर सकता है। इसके बाद दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र को इस योजना के लिए राजी करने का प्रयास किया। प्रारंभ में धृतराष्ट्र ने संकोच व्यक्त किया, लेकिन पुत्र-मोह के कारण अंततः उन्होंने द्यूत सभा आयोजित करने की अनुमति दे दी।
विदुर ने किया था विरोध
जब द्यूत क्रीड़ा का निर्णय लिया गया तो धृतराष्ट्र ने विदुर को इंद्रप्रस्थ भेजकर युधिष्ठिर को आमंत्रित करने का आदेश दिया। विदुर इस योजना के परिणामों को भली-भांति समझते थे। उन्होंने धृतराष्ट्र को समझाने का प्रयास किया कि यह आयोजन भविष्य में बड़े संकट का कारण बन सकता है। किन्तु धृतराष्ट्र ने उनकी बात नहीं मानी। तब विदुर हस्तिनापुर के आदेश का पालन करते हुए इंद्रप्रस्थ पहुंचे और युधिष्ठिर को द्यूत क्रीड़ा का निमंत्रण दिया।
युधिष्ठिर ने निमंत्रण स्वीकार क्यों किया?
महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार युधिष्ठिर के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि क्या उन्हें हस्तिनापुर के राजपरिवार की ओर से भेजे गए निमंत्रण को अस्वीकार करना चाहिए। उस समय राजाओं के बीच यह परंपरा थी कि यदि किसी समकक्ष राजा या राजपरिवार की ओर से द्यूत क्रीड़ा अथवा किसी प्रतियोगिता का निमंत्रण दिया जाए तो उसे ठुकराना उचित नहीं माना जाता था। युधिष्ठिर स्वयं भी इस परंपरा से बंधे हुए थे।
जब विदुर ने उन्हें निमंत्रण दिया, तब युधिष्ठिर ने कहा कि वे द्यूत क्रीड़ा को अच्छा नहीं मानते और जानते हैं कि इससे कलह उत्पन्न होता है। फिर भी उन्होंने यह भी कहा कि यदि उन्हें विधिवत आमंत्रित किया गया है तो वे राजधर्म और क्षत्रिय परंपरा के कारण उसे अस्वीकार नहीं कर सकते।
महाभारत में यह उल्लेख मिलता है कि युधिष्ठिर ने स्वयं स्वीकार किया था कि उन्हें द्यूत क्रीड़ा में विशेष रुचि थी, यद्यपि वे इसकी हानियों को भी जानते थे। यही कारण था कि निमंत्रण मिलने पर उन्होंने हस्तिनापुर जाने का निर्णय लिया।
धृतराष्ट्र के आदेश का सम्मान
एक अन्य महत्वपूर्ण कारण धृतराष्ट्र का स्थान था। धृतराष्ट्र केवल हस्तिनापुर के राजा ही नहीं थे, बल्कि पांडवों के ज्येष्ठ पिताश्री भी माने जाते थे। पांडव सदैव उनका सम्मान करते थे। जब निमंत्रण धृतराष्ट्र की ओर से आया तो युधिष्ठिर ने इसे केवल खेल का निमंत्रण नहीं, बल्कि परिवार के मुखिया का आदेश भी माना। उनके लिए उस आदेश की अवहेलना करना उचित नहीं था। यही कारण था कि अनेक आशंकाओं के बावजूद उन्होंने सभा में उपस्थित होने का निश्चय किया।
हस्तिनापुर में पहुंची पांडवों की सभा
निमंत्रण स्वीकार करने के बाद युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ हस्तिनापुर पहुंचे। वहां एक विशाल सभा का आयोजन किया गया था। सभा में धृतराष्ट्र, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, विदुर, दुर्योधन, कर्ण और अन्य प्रमुख व्यक्ति उपस्थित थे। जब द्यूत क्रीड़ा प्रारंभ होने वाली थी, तब युधिष्ठिर ने पूछा कि उनके विरुद्ध कौन खेलेगा। दुर्योधन ने उत्तर दिया कि उसकी ओर से शकुनि पासे फेंकेगा।
युधिष्ठिर ने इस व्यवस्था पर आपत्ति भी व्यक्त की, क्योंकि दांव लगाने वाला दुर्योधन था, जबकि खेल कोई और खेल रहा था, लेकिन सभा में उपस्थित लोगों ने कोई विरोध नहीं किया और खेल प्रारंभ हो गया।
शकुनि की चालों में फंसते गए युधिष्ठिर
द्यूत क्रीड़ा शुरू होते ही शकुनि ने अपनी कूटनीति का प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया। वह प्रत्येक दांव जीतता गया और युधिष्ठिर लगातार हारते गए। सबसे पहले युधिष्ठिर ने अपने आभूषण, स्वर्ण, रत्न और धन-संपत्ति को दांव पर लगाया। इसके बाद उन्होंने हाथी, घोड़े, रथ और सेना तक को दांव में लगा दिया, लेकिन हर बार शकुनि विजयी घोषित हुआ। जब राज्य और समस्त संपत्ति भी हार गई, तब युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को दांव पर लगाया। क्रमशः नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम भी हार गए। इसके बाद उन्होंने स्वयं को दांव पर लगा दिया और स्वयं भी पराजित हो गए।
द्रौपदी को दांव पर लगाने की घटना
महाभारत की कथा के अनुसार स्वयं को हारने के बाद भी युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगा दिया। शकुनि ने इस दांव को भी जीत लिया। इसके बाद दुर्योधन ने द्रौपदी को सभा में बुलाने का आदेश दिया। यही वह घटना थी जिसने सभा में उपस्थित अनेक महापुरुषों को व्यथित कर दिया। विदुर ने इसका विरोध किया, लेकिन दुर्योधन और उसके समर्थकों ने उनकी बात नहीं मानी। द्रौपदी ने सभा में पहुंचकर यह प्रश्न उठाया कि जो व्यक्ति स्वयं को पहले ही हार चुका हो, क्या उसे अपनी पत्नी को दांव पर लगाने का अधिकार है? इस प्रश्न का तत्काल उत्तर सभा में कोई नहीं दे सका।
पहली द्यूत क्रीड़ा का अंत
सभा में उत्पन्न स्थिति को देखकर अंततः धृतराष्ट्र चिंतित हो उठे। द्रौपदी ने उनसे न्याय की प्रार्थना की। तब धृतराष्ट्र ने द्रौपदी को वरदान मांगने का अवसर दिया। द्रौपदी ने पहले युधिष्ठिर की मुक्ति मांगी और फिर अपने अन्य पतियों की स्वतंत्रता की प्रार्थना की। धृतराष्ट्र ने सब कुछ वापस लौटा दिया और पांडवों को सम्मान सहित इंद्रप्रस्थ लौटने की अनुमति दे दी।
फिर हुआ दूसरा द्यूत