Mahabharata Mythological Story: महाभारत केवल युद्ध और राजसत्ता की कथा नहीं है, बल्कि इसमें ऐसे अनेक प्रसंग भी हैं जो पात्रों के जीवन के अनदेखे पक्षों को सामने लाते हैं। इन्हीं में से एक प्रसंग है पांडवों के महान धनुर्धर अर्जुन का बृहन्नला के रूप में एक वर्ष तक जीवन व्यतीत करना। महाभारत के विराट पर्व में वर्णित यह कथा न केवल अज्ञातवास से जुड़ी है, बल्कि इसके पीछे एक ऐसा पौराणिक रहस्य भी छिपा है, जिसका संबंध देवलोक, अप्सराओं और एक श्राप से जुड़ा हुआ है।
बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि अपराजेय योद्धा अर्जुन को आखिर बृहन्नला क्यों बनना पड़ा था। क्या यह केवल अज्ञातवास की मजबूरी थी या इसके पीछे कोई दैवी कारण भी था? आइए जानते हैं इस प्रसंग से जुड़ी पौराणिक कथा...
देवलोक की यात्रा और दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति
वनवास के दौरान जब पांडव विभिन्न कठिनाइयों का सामना कर रहे थे, तब महर्षि व्यास और अन्य ऋषियों के परामर्श पर अर्जुन ने दिव्य अस्त्र प्राप्त करने का निश्चय किया। उन्होंने कठोर तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न कर पाशुपतास्त्र प्राप्त किया। इसके बाद अनेक देवताओं ने भी उन्हें अपने-अपने दिव्य अस्त्र प्रदान किए।
इसी क्रम में देवराज इंद्र ने अर्जुन को स्वर्गलोक बुलाया। अर्जुन इंद्र के पुत्र माने जाते थे, इसलिए इंद्र ने उनका विशेष सम्मान किया। स्वर्ग में अर्जुन ने अनेक दिव्य अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया और गंधर्वों से संगीत तथा नृत्य की शिक्षा भी ग्रहण की। यही शिक्षा आगे चलकर उनके बृहन्नला रूप में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई।
उर्वशी का अर्जुन पर मोहित होना
स्वर्ग में निवास के दौरान अर्जुन ने अनेक अप्सराओं को देखा। उनमें उर्वशी सबसे अधिक प्रसिद्ध और रूपवती मानी जाती थीं। एक दिन इंद्रसभा में उर्वशी का नृत्य देखकर अर्जुन ने उनकी प्रशंसा की। अर्जुन के तेज, पराक्रम और व्यक्तित्व से उर्वशी भी प्रभावित हो गईं।
पौराणिक कथा के अनुसार उर्वशी ने अर्जुन को अपना मन दे दिया। एक रात्रि वह स्वयं अर्जुन के कक्ष में पहुंचीं और उनसे प्रेम निवेदन किया। उर्वशी ने अर्जुन के सामने विवाह अथवा प्रेम संबंध का प्रस्ताव रखा, लेकिन अर्जुन ने उर्वशी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इसके पीछे उनका एक विशेष कारण था। अर्जुन ने उर्वशी को अपनी माता के समान माना। उन्होंने विनम्रता से कहा कि चंद्रवंश की परंपरा में उर्वशी उनके पूर्वज राजा पुरुरवा की पत्नी रही थीं। इस दृष्टि से वह उनके कुल की मातृस्वरूपा थीं, इसलिए वह उनके प्रति पुत्रवत भाव रखते हैं। अर्जुन का यह उत्तर सुनकर उर्वशी अत्यंत क्रोधित हो गईं।
उर्वशी का श्राप
जब अर्जुन ने उर्वशी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया तो उर्वशी को यह अपना अपमान लगा। क्रोध में उन्होंने अर्जुन को श्राप दे दिया कि जिस पुरुषत्व पर उन्हें इतना गर्व है, वह नष्ट हो जाएगा और उन्हें स्त्रियों के बीच नपुंसक के रूप में रहना पड़ेगा। उर्वशी का यह श्राप सुनकर अर्जुन चिंतित हो गए। उन्हें लगा कि बिना किसी अपराध के उन्हें कठोर दंड मिल गया है। बाद में जब देवराज इंद्र को इस घटना का पता चला तो उन्होंने अर्जुन को सांत्वना दी।
इंद्र ने अर्जुन से कहा कि उर्वशी का श्राप वास्तव में भविष्य में उनके लिए वरदान सिद्ध होगा। उन्होंने बताया कि वनवास समाप्त होने के बाद पांडवों को एक वर्ष अज्ञातवास भी करना होगा। उस समय यह श्राप उनके काम आएगा और वह बिना पहचाने गए अपना समय व्यतीत कर सकेंगे। इंद्र के इन शब्दों से अर्जुन को राहत मिली और उन्होंने श्राप को स्वीकार कर लिया।
पांडवों का अज्ञातवास और विराट नगर में प्रवेश
द्यूत क्रीड़ा में पराजित होने के बाद पांडवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ा। शर्त यह थी कि यदि अज्ञातवास के दौरान उनकी पहचान उजागर हो जाती, तो उन्हें पुनः बारह वर्ष वनवास करना पड़ता। बारह वर्ष का वनवास पूरा होने पर पांडवों ने अज्ञातवास के लिए मत्स्य देश के राजा विराट के राज्य को चुना। सभी भाइयों ने अपनी पहचान छिपाने के लिए अलग-अलग रूप धारण किए।
युधिष्ठिर ने कंक नामक ब्राह्मण और सलाहकार का रूप लिया। भीम ने बल्लव नाम से रसोइए का कार्य संभाला। नकुल घोड़ों की देखभाल करने लगे और सहदेव गौशाला के प्रबंधक बने। द्रौपदी ने सैरंध्री बनकर रानी सुदेष्णा की दासी का कार्य किया। वहीं अर्जुन ने उर्वशी के श्राप का उपयोग करते हुए बृहन्नला का रूप धारण किया।
कैसे बने बृहन्नला?
अर्जुन ने स्वयं को एक किन्नर और नृत्य-संगीत के ज्ञाता के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने स्त्रियों के वस्त्र धारण किए और अपने वास्तविक स्वरूप को पूरी तरह छिपा लिया। क्योंकि उन्होंने स्वर्ग में गंधर्व चित्रसेन से संगीत और नृत्य की शिक्षा प्राप्त की थी, इसलिए इस भूमिका को निभाना उनके लिए कठिन नहीं था।
विराट नगर पहुंचकर अर्जुन ने राजा विराट से कहा कि वह बृहन्नला नाम का नपुंसक है और नृत्य-संगीत की शिक्षा देने में दक्ष है। राजा ने उन्हें अपनी पुत्री राजकुमारी उत्तरा के नृत्य एवं संगीत शिक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया। इस प्रकार महान धनुर्धर अर्जुन पूरे अज्ञातवास के दौरान बृहन्नला बनकर राजमहल में रहने लगे।
राजकुमारी उत्तरा को दी शिक्षा
बृहन्नला के रूप में अर्जुन का अधिकांश समय राजकुमारी उत्तरा और उनकी सखियों को नृत्य, संगीत तथा गायन सिखाने में बीतता था। महल की स्त्रियां उन्हें पूर्णतः एक किन्नर ही समझती थीं। अर्जुन ने अत्यंत सावधानी से अपना रहस्य छिपाए रखा। उनके व्यवहार, वेशभूषा और दिनचर्या से किसी को भी यह संदेह नहीं हुआ कि वह वास्तव में संसार के महानतम धनुर्धरों में से एक हैं। इसी कारण पांडवों का अज्ञातवास बिना किसी बाधा के आगे बढ़ता रहा।
कौरवों का आक्रमण और बृहन्नला का रहस्य
अज्ञातवास की अवधि समाप्त होने के निकट कौरवों को संदेह हुआ कि पांडव कहीं न कहीं छिपे हुए हैं। उन्हें खोजने के लिए उन्होंने मत्स्य देश पर आक्रमण कर दिया और वहां की गौधन को हांक ले गए। उस समय राजा विराट राज्य के दूसरे भाग में युद्ध करने गए हुए थे। राजधानी की रक्षा का भार राजकुमार उत्तर पर आ गया।
उत्तर उत्साह में तो युद्ध के लिए तैयार हो गए, लेकिन जब उन्होंने कौरवों की विशाल सेना देखी तो भयभीत हो उठे। उस समय बृहन्नला उनके सारथी बने। जब उत्तर युद्धभूमि से लौटने लगे तो अर्जुन उन्हें एक शमी वृक्ष के पास ले गए, जहां पांडवों ने अपने दिव्य अस्त्र छिपाकर रखे थे।
वहीं अर्जुन ने अपना वास्तविक परिचय दिया और बताया कि वह कोई साधारण किन्नर नहीं, बल्कि पांडवों में तीसरे भाई अर्जुन हैं। उन्होंने वृक्ष से गांडीव धनुष और अन्य अस्त्र निकाले। इसके बाद अर्जुन ने अपना बृहन्नला रूप त्याग दिया और योद्धा के रूप में युद्धभूमि में पहुंचे।
अर्जुन का पराक्रम और अज्ञातवास की पूर्णता