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Somvati Amavasya: सोमवती अमावस्या पर जरूर करें इस व्रत कथा का पाठ, भगवान शिव की बनी रहेगी विशेष कृपा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Somvati Amavasya: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवती अमावस्या के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदी या घर में गंगाजल युक्त जल से स्नान करना चाहिए। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान शिव, माता पार्वती और नंदी महाराज की पूजा करनी चाहिए।

Somvati Amavasya Vrat Katha
Somvati Amavasya Vrat Katha: सोमवती अमावस्या सनातन धर्म में अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। जब अमावस्या तिथि सोमवार के दिन पड़ती है, तब उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है और अमावस्या तिथि पितरों तथा विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के लिए शुभ मानी जाती है। इस कारण सोमवती अमावस्या का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत, स्नान, दान तथा भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

सोमवती अमावस्या के दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं। वहीं भगवान शिव के भक्त इस दिन रुद्राभिषेक, शिव पूजा और व्रत कथा का श्रवण या पाठ करते हैं। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक इस व्रत कथा का पाठ करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन के अनेक कष्ट दूर होते हैं।

उज्जैन की निर्धन ब्राह्मण कन्या की कथा

प्राचीन समय की बात है। एक नगर में अत्यंत धर्मनिष्ठ किन्तु निर्धन ब्राह्मण अपने परिवार सहित निवास करता था। उसके परिवार में उसकी पत्नी, पुत्र और एक कन्या थी। ब्राह्मण सदैव धर्म-कर्म और पूजा-पाठ में लगा रहता था, लेकिन आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर थी।

एक दिन एक तेजस्वी साधु उसके घर भिक्षा लेने आए। ब्राह्मण परिवार ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका सत्कार किया। साधु ने प्रसन्न होकर ब्राह्मण परिवार को आशीर्वाद दिया। जब साधु की दृष्टि ब्राह्मण की कन्या पर पड़ी तो वे कुछ क्षण मौन हो गए। ब्राह्मण दंपति ने इसका कारण पूछा। तब साधु ने कहा कि कन्या अत्यंत गुणवान है, किन्तु उसके भाग्य में वैधव्य योग दिखाई दे रहा है। यह सुनकर ब्राह्मण और उसकी पत्नी अत्यंत दुखी हो गए। उन्होंने साधु से इस दोष को दूर करने का उपाय पूछा।

सोमा नामक धर्मपरायण स्त्री का उल्लेख

साधु ने कहा कि दूर सिंहल द्वीप में सोमा नाम की एक अत्यंत पुण्यात्मा और पतिव्रता स्त्री रहती है। उसने सोमवती अमावस्या के व्रत का प्रभाव और पुण्य अर्जित किया है। यदि वह अपनी इच्छा से इस कन्या को अपना पुण्य प्रदान कर दे, तो कन्या का वैधव्य दोष समाप्त हो सकता है।

साधु की बात सुनकर ब्राह्मण का पुत्र अपनी बहन के कल्याण के लिए सिंहल द्वीप जाने का निश्चय करता है। वह अपनी बहन को साथ लेकर कठिन यात्रा पर निकल पड़ता है। अनेक वन, पर्वत और नदियों को पार करते हुए दोनों भाई-बहन लंबे समय बाद सिंहल द्वीप पहुंचते हैं।

सोमा की सेवा से प्रसन्न हुई पतिव्रता स्त्री

सिंहल द्वीप पहुंचकर दोनों भाई-बहन सोमा के घर के निकट रहने लगे। वे प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर बिना बताए उसके घर की सफाई कर देते और अन्य कार्यों में सहायता करते। कई दिनों तक ऐसा चलता रहा। एक दिन सोमा ने आश्चर्य व्यक्त किया कि उसके घर का कार्य कौन कर जाता है। उसने अपने परिवार के लोगों से पूछा, किन्तु कोई उत्तर नहीं मिला। तब उसने एक दिन छिपकर देखने का निश्चय किया।

प्रातःकाल उसने देखा कि एक युवक और युवती उसके घर की सेवा कर रहे हैं। सोमा ने उन्हें रोककर उनका परिचय पूछा। तब ब्राह्मण कन्या और उसके भाई ने अपनी पूरी कथा सुनाई और बताया कि वे उसकी शरण में सहायता मांगने आए हैं। यह सुनकर सोमा का हृदय करुणा से भर उठा। उसने ब्राह्मण कन्या की सहायता करने का निश्चय किया और उसे अपने साथ ले गई।

कन्या के विवाह और वैधव्य योग का प्रसंग

कुछ समय बाद ब्राह्मण कन्या का विवाह एक योग्य वर से संपन्न हुआ। लेकिन विवाह के समय ही वर के प्राण संकट में पड़ गए। यह देखकर सभी लोग दुखी हो उठे। उसी समय सोमा ने अपने सोमवती अमावस्या व्रत का समस्त पुण्य उस कन्या को अर्पित कर दिया। व्रत के प्रभाव और सोमा के पुण्य से वर पुनः जीवित हो उठा और कन्या का वैधव्य दोष समाप्त हो गया। इस प्रकार भगवान शिव और सोमवती अमावस्या व्रत की महिमा से उस कन्या का जीवन सुखमय हो गया।

सोमा के जीवन में आया परिवर्तन

कथा के अनुसार जब सोमा ने अपना संचित पुण्य ब्राह्मण कन्या को प्रदान किया, तब उसके अपने जीवन में संकट उत्पन्न हो गया। उसके पति के प्राण संकट में पड़ गए। तब सोमा ने पुनः श्रद्धा और नियमपूर्वक सोमवती अमावस्या का व्रत किया।

उसने भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना की तथा पीपल वृक्ष की परिक्रमा कर विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की। उसके व्रत और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसके पति को पुनः स्वस्थ और दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया। तभी से सोमवती अमावस्या व्रत को अखंड सौभाग्य, दांपत्य सुख और भगवान शिव की कृपा प्रदान करने वाला माना जाता है।

सोमवती अमावस्या पर कैसे करें व्रत कथा का पाठ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवती अमावस्या के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदी या घर में गंगाजल युक्त जल से स्नान करना चाहिए। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान शिव, माता पार्वती और नंदी महाराज की पूजा करनी चाहिए।

शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और अक्षत अर्पित किए जाते हैं। इसके पश्चात दीप और धूप प्रज्वलित कर सोमवती अमावस्या व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ या श्रवण किया जाता है। कई स्थानों पर पीपल वृक्ष की पूजा कर उसकी 108 परिक्रमा करने की परंपरा भी प्रचलित है। व्रत कथा के अंत में भगवान शिव से परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की प्रार्थना की जाती है तथा यथाशक्ति दान-पुण्य किया जाता है।

भगवान शिव की कृपा से जुड़ी धार्मिक मान्यता

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवती अमावस्या पर श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ व्रत कथा का पाठ करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। शिव-पार्वती की कृपा से दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और साधक को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। इसी कारण सनातन परंपरा में सोमवती अमावस्या के दिन व्रत, पूजा और कथा श्रवण को अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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