Jyeshtha Skanda Sashti Vrat Katha: सनातन धर्म में भगवान कार्तिकेय को देवताओं के सेनापति, युद्ध और शौर्य के देवता तथा भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में पूजा जाता है। प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि भगवान स्कंद अर्थात कार्तिकेय को समर्पित मानी गई है। ज्येष्ठ मास में आने वाली स्कंद षष्ठी का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। इस दिन श्रद्धालु भगवान कार्तिकेय का व्रत रखकर विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए व्रत कथा का पाठ करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और स्कंद षष्ठी व्रत कथा सुनने से भगवान कार्तिकेय प्रसन्न होते हैं तथा अपने भक्तों पर विशेष कृपा बनाए रखते हैं।
ज्येष्ठ स्कंद षष्ठी का धार्मिक महत्व
स्कंद पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में भगवान कार्तिकेय की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। उन्हें स्कंद, षण्मुख, कुमारस्वामी, मुरुगन और सुब्रह्मण्य जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। देवताओं की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए भगवान कार्तिकेय ने अनेक असुरों का संहार किया था। इसी कारण उन्हें देवसेना के अधिपति के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। ज्येष्ठ स्कंद षष्ठी के दिन भक्त भगवान कार्तिकेय की पूजा कर उनके पराक्रम, तेज और दिव्य स्वरूप का स्मरण करते हैं। इस दिन व्रत रखने और कथा सुनने का विशेष फल बताया गया है।
भगवान कार्तिकेय का दिव्य प्राकट्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय तारकासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या कर भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव होगा। उस समय माता सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव गहन तपस्या में लीन थे। देवता तारकासुर के अत्याचारों से अत्यंत दुखी थे और उन्हें उसके अंत का कोई उपाय दिखाई नहीं दे रहा था।
बाद में माता पार्वती ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया। भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य तेज से उत्पन्न अग्नि को देवताओं ने सुरक्षित रखा। उस तेज को गंगा ने धारण किया और अंततः सरवन वन में छह दिव्य बालकों का प्राकट्य हुआ। छह कृतिका देवियों ने उन बालकों का पालन-पोषण किया। बाद में माता पार्वती ने अपने दिव्य स्वरूप से उन छह बालकों को एक कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप छह मुख वाले भगवान षण्मुख कार्तिकेय प्रकट हुए। इसी कारण उन्हें कार्तिकेय और षण्मुख कहा जाता है।
देवताओं के सेनापति बने भगवान स्कंद
जब भगवान कार्तिकेय युवा हुए तो देवताओं ने उन्हें अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया। भगवान इंद्र सहित सभी देवताओं ने उनका अभिषेक किया और दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। भगवान शिव ने उन्हें शक्ति अस्त्र दिया, जो अत्यंत प्रभावशाली माना गया। भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर आरूढ़ होकर देवसेना का नेतृत्व करने लगे। उनके तेज और पराक्रम से समस्त देवगण प्रसन्न हुए और उन्हें देवसेनापति की उपाधि प्रदान की गई।
ज्येष्ठ स्कंद षष्ठी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार तारकासुर के अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे थे। उसने तीनों लोकों में अपना आतंक फैला रखा था। देवता, ऋषि-मुनि और मनुष्य सभी उसके अत्याचारों से पीड़ित थे। यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में विघ्न डाला जा रहा था। देवताओं ने एकत्र होकर भगवान शिव और माता पार्वती की शरण ली।
देवताओं ने विनती करते हुए कहा कि तारकासुर के कारण धर्म और व्यवस्था संकट में पड़ गई है, तब भगवान शिव ने अपने पुत्र कार्तिकेय को देवताओं की रक्षा का दायित्व सौंपा। भगवान कार्तिकेय ने देवसेना का नेतृत्व किया और असुरों के विरुद्ध युद्ध का संकल्प लिया। विशाल युद्धभूमि में देवताओं और असुरों के बीच घोर संग्राम आरंभ हुआ। तारकासुर अत्यंत बलशाली और मायावी था। उसके पास अनेक दिव्य शक्तियां थीं, जिनके कारण देवताओं के लिए उसे पराजित करना कठिन था।
युद्ध के दौरान तारकासुर ने अनेक प्रकार की मायाएं रचीं, लेकिन भगवान कार्तिकेय ने अपने दिव्य ज्ञान और पराक्रम से उन सभी का नाश कर दिया। उनके छह मुखों से दिव्य तेज प्रकट हो रहा था और उनके हाथों में धारण किए गए अस्त्र-शस्त्र असुरों के लिए विनाशकारी सिद्ध हो रहे थे।
युद्ध कई दिनों तक चलता रहा। अंततः भगवान कार्तिकेय ने अपने दिव्य शक्ति अस्त्र का प्रयोग किया। वह अस्त्र अत्यंत वेग से तारकासुर की ओर बढ़ा और उसके वक्षस्थल को भेद गया। उसी क्षण तारकासुर का अंत हो गया और देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति मिली। तारकासुर के वध के बाद देवताओं ने भगवान कार्तिकेय की स्तुति की। समस्त दिशाओं में विजय घोष होने लगा। देवताओं ने पुष्पवर्षा कर भगवान स्कंद का अभिनंदन किया और उन्हें धर्म की रक्षा करने वाला देवसेनापति कहा।
धार्मिक मान्यता है कि जिस प्रकार भगवान कार्तिकेय ने देवताओं के संकटों का निवारण किया, उसी प्रकार वे अपने भक्तों की प्रार्थना सुनकर उन पर कृपा बरसाते हैं। इसी कारण स्कंद षष्ठी के दिन उनकी आराधना और व्रत कथा का विशेष महत्व बताया गया है।
व्रत कथा से जुड़ी एक प्रचलित मान्यता