Adhik Jyeshtha Amavasya: अमावस्या के दिन ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सूर्योदय के बाद तक का समय स्नान और दान के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार श्रद्धालुओं को प्रातःकाल उठकर स्नान करना चाहिए।
Adhik Jyeshtha Amavasya: हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। प्रत्येक अमावस्या पितरों के स्मरण, तर्पण, स्नान और दान-पुण्य के लिए शुभ मानी जाती है, लेकिन जब यह तिथि अधिक मास में आती है तो इसका महत्व और बढ़ जाता है। वर्ष 2026 में पड़ रही ज्येष्ठ अधिक अमावस्या श्रद्धालुओं के लिए विशेष पुण्यदायी मानी जा रही है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, पितरों का तर्पण और जरूरतमंदों को दान करने की परंपरा है। चूंकि इस बार अमावस्या सोमवार के दिन पड़ रही है, इसलिए इसे सोमवती अमावस्या के रूप में भी मनाया जाएगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए स्नान, जप, तप और दान का विशेष फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि देशभर के मंदिरों, तीर्थस्थलों और नदी घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है।
ज्येष्ठ अधिक अमावस्या कब है?
पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि का आरंभ 14 जून 2026 को दोपहर लगभग 12:20 बजे होगा और इसका समापन 15 जून 2026 को सुबह लगभग 8:24 बजे होगा। उदया तिथि के आधार पर ज्येष्ठ अधिक अमावस्या का व्रत, स्नान-दान और धार्मिक अनुष्ठान 15 जून 2026, सोमवार को किए जाएंगे।
सोमवार के दिन अमावस्या पड़ने के कारण इस तिथि का महत्व और बढ़ गया है। इस दिन भगवान शिव की पूजा के साथ-साथ पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों को भी विशेष फलदायी माना जाता है।
स्नान-दान का शुभ समय
अमावस्या के दिन ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सूर्योदय के बाद तक का समय स्नान और दान के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार श्रद्धालुओं को प्रातःकाल उठकर स्नान करना चाहिए और इसके बाद पूजा-पाठ, तर्पण तथा दान के कार्य करने चाहिए। जो लोग तीर्थस्थलों पर जाकर स्नान नहीं कर सकते, वे घर में स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। स्नान के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य देना और भगवान विष्णु तथा भगवान शिव का पूजन करना शुभ माना गया है।
अमावस्या पर स्नान का धार्मिक महत्व
सनातन परंपरा में जल को पवित्रता और शुद्धि का प्रतीक माना गया है। अमावस्या के दिन पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करने से शरीर और मन की शुद्धि होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किया गया स्नान व्यक्ति को पुण्य प्रदान करता है और नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।
गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, सरयू और अन्य पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। अमावस्या पर तीर्थ स्नान के लिए अनेक श्रद्धालु हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी, उज्जैन और अन्य धार्मिक स्थलों की यात्रा भी करते हैं।
दान का क्यों है विशेष महत्व?
ज्येष्ठ अधिक अमावस्या पर दान का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से किया गया दान कई गुना पुण्य प्रदान करता है। विशेष रूप से अन्न, वस्त्र, जल, फल, छाता, जूते-चप्पल और दक्षिणा का दान शुभ माना जाता है। ज्येष्ठ मास में गर्मी का प्रभाव अधिक रहने के कारण जल से जुड़े दान को भी विशेष महत्व दिया जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन प्यासे लोगों को पानी पिलाने, जलपात्र दान करने और गरीबों को भोजन कराने का संकल्प लेते हैं।
पितरों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह तिथि?
अमावस्या को पितरों की तिथि माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पितरों का तर्पण करने से उन्हें तृप्ति प्राप्त होती है, इसलिए ज्येष्ठ अधिक अमावस्या पर तिल, जल और कुश के साथ तर्पण करने की परंपरा है।
जो लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में दान-पुण्य करते हैं, उनके लिए भी यह दिन विशेष माना जाता है। पितरों के नाम से किए गए दान और धार्मिक कर्मों को शुभ फलदायी बताया गया है। कई श्रद्धालु इस अवसर पर ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और पितरों के निमित्त प्रार्थना करते हैं।
अधिक मास में अमावस्या का महत्व
अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है और यह भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। हिंदू पंचांग में जब सूर्य और चंद्र गणना के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है, तब उसे अधिक मास कहा जाता है।
धार्मिक दृष्टि से इस पूरे मास में जप, तप, व्रत, दान और पूजा-पाठ का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसे में अधिक मास में आने वाली अमावस्या को भी अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन विशेष पूजा-अर्चना कर भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
ज्येष्ठ अधिक अमावस्या पर क्या करें?
प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें।
यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी या तीर्थस्थल पर स्नान करें।
सूर्यदेव को जल अर्पित करें।
भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा करें।
पितरों के निमित्त तर्पण करें।
जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान दें।
पीपल वृक्ष की पूजा कर जल अर्पित करें।
धार्मिक ग्रंथों का पाठ और मंत्र जप करें।
गाय, पक्षियों और अन्य जीवों को भोजन कराएं।
किन बातों का रखें ध्यान?
धार्मिक कार्यों को श्रद्धा और शांत मन से करना चाहिए।
दान अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए।
तर्पण और पूजा के समय शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
अमावस्या के दिन सात्विक भोजन ग्रहण करने की परंपरा मानी जाती है।
धार्मिक कार्यों के दौरान क्रोध, विवाद और अपशब्दों से बचने का प्रयास करना चाहिए।
ज्येष्ठ अधिक अमावस्या श्रद्धालुओं के लिए स्नान, दान, तर्पण और पूजा-पाठ का महत्वपूर्ण अवसर मानी जाती है। विशेष रूप से अधिक मास और सोमवती अमावस्या का संयोग इस तिथि के धार्मिक महत्व को और अधिक बढ़ा देता है, जिसके कारण इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुण्य कर्मों और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)