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Swami Avdheshanand Giri Ji Maharaj: कंस ने श्रीकृष्ण को बुलाने के लिए अक्रूर को क्यों भेजा? जानिए क्या था कारण

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज
सार

Krishna Leela: जब अक्रूर रथ लेकर ब्रज पहुंचे और श्रीकृष्ण तथा बलराम को मथुरा चलने के लिए आमंत्रित किया, तो पूरा ब्रज शोक में डूब गया।
 

Swami Avdheshanand Giri Ji Maharaj
Spiritual Story: भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं केवल धार्मिक कथाएं नहीं हैं, बल्कि उनमें गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा होता है। ऐसी ही एक कथा है जब कंस ने श्रीकृष्ण को मथुरा बुलाने के लिए अपने दूत अक्रूर को भेजा। यह घटना न केवल राजनीतिक योजना थी, बल्कि भगवान की लीला का महत्वपूर्ण मोड़ भी थी। मथुरा का राजा कंस श्रीकृष्ण से अत्यंत भयभीत था, क्योंकि उसे भविष्यवाणी से पता था कि देवकी का आठवां पुत्र उसका अंत करेगा। अनेक प्रयासों के बाद भी जब वह श्रीकृष्ण को मार नहीं सका, तो उसने एक नया षड्यंत्र रचा। उसने अपने विश्वासपात्र मंत्री अक्रूर को आदेश दिया कि वह ब्रज जाए और श्रीकृष्ण तथा बलराम को मथुरा लाए। अक्रूर धर्मनिष्ठ और भगवान के भक्त थे, लेकिन कंस के आदेश से वे इस कार्य के लिए विवश हुए।

ब्रज में श्रीकृष्ण का बचपन गोकुल और वृंदावन की गोपियों, यशोदा माता और नंद बाबा के स्नेह में बीत रहा था। वहां का वातावरण प्रेम, आनंद और सरलता से भरा हुआ था। जब अक्रूर के आने की सूचना मिली, तो सभी को यह आभास हो गया कि अब भगवान का ब्रज से विदा होने का समय आ गया है। यशोदा माता और नंद बाबा के हृदय में करुणा और चिंता भर गई। गोपियां, विशेषकर राधा और अन्य सखियां, अत्यंत व्याकुल हो उठीं।

श्रीकृष्ण का प्रस्थान 

जब अक्रूर रथ लेकर ब्रज पहुंचे और श्रीकृष्ण तथा बलराम को मथुरा चलने के लिए आमंत्रित किया, तो पूरा ब्रज शोक में डूब गया। ऐसा माना जाता है कि भगवान ने ब्रज में लगभग ग्यारह वर्ष, ग्यारह महीने और ग्यारह दिन का समय व्यतीत किया। उनके रथ में बैठते ही ऐसा लगा मानो ब्रज की आत्मा ही निकल गई हो। वृंदावन की हर गली, हर वृक्ष और हर जीव उदास हो गया।

मार्ग में गोपियों का प्रेम 

जब श्रीकृष्ण रथ में मथुरा की ओर बढ़ रहे थे, तो मार्ग में गोपियां भावविह्वल होकर बीच में आ गईं। उन्होंने रथ को रोकने का प्रयास किया, क्योंकि उनके लिए श्रीकृष्ण केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन का आधार थे। ऐसा वर्णन आता है कि पशु-पक्षी और प्रकृति भी इस वियोग को सहन नहीं कर पा रहे थे। यह दृश्य इस बात का प्रतीक है कि जब ईश्वर प्रेम से जुड़ता है, तो संपूर्ण प्रकृति भी भावनाओं से भर जाती है।

राधा जी का आध्यात्मिक अर्थ

इस प्रसंग में राधा जी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। उन्होंने सभी को समझाया कि श्रीकृष्ण केवल शरीर रूप में जा रहे हैं, लेकिन उनका आत्मतत्त्व सर्वत्र विद्यमान है। राधा ने गोपियों को यह संदेश दिया कि आंखें बंद करके ध्यान करने से श्रीकृष्ण हर स्थान पर अनुभव किए जा सकते हैं। उनका जाना केवल लीला का एक भाग है, वास्तविक रूप से वे सदैव ब्रज में ही हैं। यह कथा हमें यह सिखाती है कि ईश्वर का संबंध केवल शारीरिक उपस्थिति तक सीमित नहीं होता। श्रीकृष्ण का ब्रज छोड़ना एक लीला थी, लेकिन उनका प्रेम और आत्मिक स्वरूप हमेशा वहां बना रहा। अक्रूर का आगमन इस लीला का माध्यम बना, जिसने भक्तों को विरह और भक्ति दोनों की गहराई का अनुभव कराया।

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