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Sanjeev Krishna Thakur Ji Maharaj: जन्म और मृत्यु का मूल कारण है तृष्णा, संजीव कृष्ण ठाकुर जी ने बताया रहस्य

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
श्री संजीव कृष्ण ठाकुर जी महाराज
सार

Spiritual Awakening: तृष्णा के समाप्त होते ही जन्म और मृत्यु का कारण भी समाप्त हो जाता है। यही अवस्था मोक्ष कहलाती है, जहां जीव पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त होकर परम शांति को प्राप्त करता है। 
 

Sanjeev Krishna Thakur Ji Maharaj
Vedic Knowledge: भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में जन्म और मृत्यु के रहस्य पर बहुत गहराई से विचार किया गया है। संतों, महापुरुषों और शास्त्रों ने बार-बार यह बताया है कि जीव बार-बार संसार में जन्म क्यों लेता है और मृत्यु के बाद फिर नए शरीर को क्यों प्राप्त करता है। इसी विषय पर पूज्य संजीव कृष्ण ठाकुर जी महाराज ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्य बताया है कि जन्म और मृत्यु के इस अंतहीन चक्र का मूल कारण केवल एक है- तृष्णा।

संजीव कृष्ण ठाकुर जी महाराज खहते हैं कि श्रीमद्भागवत में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को समझाते हुए कहा कि जीव अनेक योनियों में क्यों भटकता है। इसका कारण उसकी अधूरी इच्छाएं, वासनाएं और कामनाएं हैं। मनुष्य जब इस संसार से विदा होता है, तब उसके भीतर अनेक प्रकार की इच्छाएं शेष रह जाती हैं। वह सब कुछ प्राप्त नहीं कर पाता जिसकी उसने कल्पना की होती है। यही अधूरी इच्छाएं उसे फिर से संसार में खींच लाती हैं।

जब तक मन में किसी वस्तु, व्यक्ति, पद, प्रतिष्ठा, धन, सुख या भोग की लालसा बनी रहती है, तब तक जीव का संसार से संबंध समाप्त नहीं होता। मृत्यु केवल शरीर की होती है, लेकिन इच्छाएं समाप्त नहीं होतीं। यही इच्छाएं अगले जन्म का कारण बन जाती हैं।

तृष्णा ही है बंधन का कारण 

तृष्णा का अर्थ है किसी वस्तु को पाने की तीव्र चाह। जब यह चाह आवश्यकता से आगे बढ़कर आसक्ति का रूप ले लेती है, तब वही बंधन बन जाती है। मनुष्य जीवनभर कुछ न कुछ प्राप्त करने के पीछे भागता रहता है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी खड़ी हो जाती है। दूसरी पूरी होती है तो तीसरी जन्म ले लेती है। इस प्रकार इच्छाओं की यह श्रृंखला कभी समाप्त नहीं होती। इसी कारण जीव को बार-बार जन्म लेना पड़ता है। वह सोचता है कि अगले अवसर में अपनी अधूरी कामनाओं को पूरा कर लेगा, लेकिन फिर नई इच्छाएँ पैदा हो जाती हैं। परिणामस्वरूप जन्म और मृत्यु का चक्र चलता रहता है।

सकाम कर्म पुनर्जन्म का कारण 

शास्त्रों में कहा गया है कि केवल पाप ही नहीं, बल्कि सकाम पुण्य भी पुनर्जन्म का कारण बन सकता है। यदि कोई व्यक्ति पुण्य कर्म करता है लेकिन उसके पीछे किसी फल की इच्छा रखता है, तो उसे उस पुण्य का फल भोगना पड़ता है। फल भोगने के लिए उसे पुनः जन्म लेना पड़ता है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति धन, यश, वैभव या स्वर्ग की प्राप्ति की कामना से पुण्य करता है, तो उसे उन फलों को प्राप्त करने के लिए संसार में आना ही पड़ेगा। इसलिए केवल अच्छे कर्म करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके पीछे की भावना भी शुद्ध होनी चाहिए।

गीता का निष्काम कर्म का संदेश

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निष्काम कर्म का उपदेश दिया है। भगवान कहते हैं कि मनुष्य को कर्म अवश्य करना चाहिए, लेकिन कर्म के फल की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। जब कर्म भगवान को समर्पित होकर किया जाता है, तब वह बंधन का कारण नहीं बनता। फल की अपेक्षा रखने से कर्म का बंधन उत्पन्न होता है, जबकि समर्पण भाव से किया गया कर्म मन को शुद्ध करता है और जीव को मुक्ति की ओर ले जाता है। निष्काम कर्म का अर्थ कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि कर्म के प्रति आसक्ति और फल की लालसा का त्याग करना है।

तृष्णा से मुक्ति ही मोक्ष का मार्ग

जब मनुष्य अपनी इच्छाओं, वासनाओं और तृष्णाओं पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है, तब उसके भीतर शांति का उदय होता है। वह समझने लगता है कि संसार की वस्तुएं क्षणिक हैं और उनमें स्थायी सुख नहीं है। इस समझ के साथ जब वह ईश्वर की भक्ति, आत्मचिंतन और निष्काम कर्म के मार्ग पर चलता है, तब धीरे-धीरे उसकी तृष्णाएं समाप्त होने लगती हैं।

जन्म और मृत्यु का कारण 

तृष्णा के समाप्त होते ही जन्म और मृत्यु का कारण भी समाप्त हो जाता है। यही अवस्था मोक्ष कहलाती है, जहां जीव पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त होकर परम शांति को प्राप्त करता है। इसलिए संत-महात्मा बार-बार यही संदेश देते हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि तृष्णा से मुक्ति और ईश्वर की प्राप्ति है। यही जन्म और मृत्यु के रहस्य का सार है।

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