Ramayana Story: हनुमान जी ने अपना मंत्र इसलिए नहीं बदला कि उनके मन में श्रीराम के प्रति प्रेम कम हो गया था, बल्कि इसलिए कि उन्हें भरत जी में श्रीराम के प्रति अद्वितीय प्रेम दिखाई दिया।
Hanuman Katha: रामायण में हनुमान जी को भगवान श्रीराम का सबसे बड़ा भक्त माना गया है। उनके हृदय, वचन और कर्म में हर समय केवल श्रीराम का ही नाम बसता था। वे निरंतर “राम-राम” का जप करते रहते थे, लेकिन एक प्रसंग ऐसा भी आता है, जब हनुमान जी अपने प्रिय प्रभु श्रीराम का नाम लेने के स्थान पर भरत जी का गुणगान करने लगते हैं। यह प्रसंग भक्तों को भक्ति, विनम्रता और प्रेम का अद्भुत संदेश देता है।
लंका युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण जी शक्ति बाण लगने से मूर्छित हो गए, तब वैद्य सुषेण ने संजीवनी बूटी लाने का उपाय बताया। हनुमान जी तत्काल हिमालय की ओर चले गए। जब उन्हें संजीवनी बूटी पहचान में नहीं आई, तब उन्होंने पूरा पर्वत ही उठा लिया और उसे लेकर लंका की ओर उड़ चले।
रात्रि के समय जब हनुमान जी संजीवनी पर्वत लेकर आकाश मार्ग से जा रहे थे, तब अयोध्या के निकट नंदिग्राम में तपस्या कर रहे भरत जी की दृष्टि उन पर पड़ी। भरत जी ने देखा कि कोई विशालकाय रूपधारी व्यक्ति पर्वत लेकर उड़ रहा है। उन्हें लगा कि कहीं कोई राक्षस अयोध्या पर आक्रमण करने नहीं आ रहा है।
हनुमान जी का गिरना
भगवान की इच्छा से भरत जी ने बिना फल वाला एक बाण छोड़ा। वह बाण हनुमान जी को लगा और वे पर्वत सहित धरती पर आ गिरे। गिरते समय भी हनुमान जी के मुख से केवल “राम-राम” का उच्चारण ही निकल रहा था। उनकी वाणी में प्रभु का नाम और हृदय में प्रभु का स्मरण था। जब भरत जी उनके पास पहुंचे और उन्होंने श्रीराम का नाम सुना, तब उन्हें समझ में आया कि यह कोई शत्रु नहीं, बल्कि प्रभु श्रीराम के परम भक्त हनुमान हैं। भरत जी ने अत्यंत प्रेम और आदर के साथ हनुमान जी को अपने हृदय से लगा लिया। इसके बाद हनुमान जी ने उन्हें पूरी कथा सुनाई कि कैसे श्रीराम, लक्ष्मण और वानर सेना लंका में युद्ध कर रही है और लक्ष्मण जी के प्राण बचाने के लिए वे संजीवनी लेकर जा रहे हैं।
हनुमान जी ने क्यों बदला अपना मंत्र?
रामभद्राचार्य जी महाराज इस प्रसंग का बड़ा सुंदर वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि जब हनुमान जी ने भरत जी का श्रीराम के प्रति अद्भुत प्रेम देखा, तब वे उनके भक्तिभाव से अभिभूत हो गए। हनुमान जी समझ गए कि भरत जी का श्रीराम के चरणों में प्रेम अपार है। वे स्वयं महान भक्त थे, लेकिन भरत जी का त्याग, समर्पण और प्रेम देखकर उनके मन में भरत जी के प्रति विशेष श्रद्धा उत्पन्न हो गई। इसी भाव में हनुमान जी ने कुछ समय के लिए अपना जप बदल दिया। पहले वे निरंतर “राम-राम” का स्मरण करते थे, लेकिन अब उनके मुख से यह वाणी निकलने लगी। “भरत बाहु बल, शील, गुन, प्रभुपद प्रीति अपार।
मन महं जात सराहत, पुनि पुनि पवनकुमार॥”
अर्थात पवनपुत्र हनुमान जी बार-बार अपने मन में भरत जी के बल, उनके उत्तम स्वभाव, श्रेष्ठ गुणों और भगवान श्रीराम के चरणों में उनके अपार प्रेम की प्रशंसा करने लगे।
श्रीराम ने लगाया हृदय से
जब हनुमान जी संजीवनी लेकर वापस पहुंचे और लक्ष्मण जी स्वस्थ हो गए, तब उन्होंने श्रीराम को भरत जी के प्रेम और भक्ति का वर्णन सुनाया। हनुमान जी की बातें सुनकर श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने हनुमान जी को प्रेमपूर्वक अपने हृदय से लगा लिया। यह प्रसंग बताता है कि सच्चा भक्त केवल भगवान से ही प्रेम नहीं करता, बल्कि भगवान के भक्तों का भी सम्मान करता है। हनुमान जी ने भरत जी के गुणों का गुणगान करके यह संदेश दिया कि जो व्यक्ति प्रभु के चरणों में पूर्ण समर्पित होता है, वह स्वयं वंदनीय बन जाता है।
इस प्रसंग से मिलती है ये सीख
हनुमान जी और भरत जी का यह प्रसंग भक्ति की सर्वोच्च भावना को प्रकट करता है। हनुमान जी ने अपना मंत्र इसलिए नहीं बदला कि उनके मन में श्रीराम के प्रति प्रेम कम हो गया था, बल्कि इसलिए कि उन्हें भरत जी में श्रीराम के प्रति अद्वितीय प्रेम दिखाई दिया। उन्होंने भरत जी के गुणों का स्मरण करके भक्त की महिमा का सम्मान किया। यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान के साथ-साथ उनके सच्चे भक्तों का आदर करना भी भक्ति का महत्वपूर्ण अंग है। जहां विनम्रता, समर्पण और निष्काम प्रेम होता है, वहीं भगवान की कृपा और भक्ति का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है।