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Pandit Pradeep Mishra Ji Maharaj: भगवान शिव पर चढ़ी भस्म में है अद्भुत शक्ति, पंडित प्रदीप मिश्रा जी ने बताया

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज
सार

Spiritual Power: भगवान शिव पर चढ़ी हुई भस्म केवल पूजा की सामग्री नहीं है, बल्कि वह शिव कृपा, वैराग्य, आध्यात्मिक शक्ति और संरक्षण का प्रतीक मानी जाती है।

Pandit Pradeep Mishra Ji Maharaj
Divine Protection in Life: सनातन धर्म में भगवान शिव की पूजा का अत्यंत विशेष महत्व माना गया है। शिवभक्त अपने जीवन में कई ऐसे धार्मिक कार्य करते हैं जो उन्हें आध्यात्मिक शक्ति और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने में सहायता करते हैं। प्रसिद्ध कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज के अनुसार प्रत्येक शिवभक्त को तीन चीजें अवश्य धारण करनी चाहिए। पहला रुद्राक्ष, दूसरा भगवान शिव को अर्पित किए गए जल का आचमन और तीसरा भगवान शिव पर चढ़ी हुई भस्म या विभूति को अपने मस्तक पर लगाना। माना जाता है कि ऐसा करने से व्यक्ति को मानसिक, वाचिक और शारीरिक दोषों से मुक्ति मिलती है तथा भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

भस्म का पहला नाम- विभूति

शिव महापुराण में भगवान शिव पर चढ़ी हुई भस्म के पांच नाम बताए गए हैं। इनमें पहला नाम है “विभूति”। विभूति का अर्थ होता है ऐश्वर्य, समृद्धि और वैभव। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान शिव की विभूति को अपने मस्तक पर धारण करता है, उसे जीवन में सुख, समृद्धि और सम्मान प्राप्त होता है। यह केवल भौतिक ऐश्वर्य ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का भी प्रतीक है। इसलिए स्त्री, पुरुष, बच्चे और गृहस्थ सभी विभूति धारण कर सकते हैं।

भस्म का दूसरा नाम- भसित

भस्म का दूसरा नाम “भसित” बताया गया है। इसका अर्थ है वह व्यक्ति जो केवल भगवान शिव को अपना सर्वस्व मानता है और स्वयं को उनकी शरण में समर्पित कर देता है। जब कोई श्रद्धालु अपने मस्तक पर भस्म लगाता है, तो वह शिव कृपा का अधिकारी बन जाता है। मान्यता है कि उसके जीवन का संचालन स्वयं भगवान शिव की कृपा से होता है। शिवभक्तों का विश्वास है कि भसित रूप में धारण की गई भस्म व्यक्ति को नकारात्मक शक्तियों, भय और अशुभ प्रभावों से बचाने का कार्य करती है।

भस्म का तीसरा नाम- भस्म

भस्म का तीसरा नाम स्वयं “भस्म” है। इसका अर्थ है जलाकर समाप्त कर देना। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब भक्त भगवान शिव पर चढ़ी हुई भस्म को अपने मस्तक पर लगाता है, तब उसके जीवन के पाप, बुरे कर्म और नकारात्मक विचार धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं। भस्म हमें यह भी संदेश देती है कि संसार की सभी वस्तुएं नश्वर हैं और अंततः सब कुछ मिट्टी या राख में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए मनुष्य को अहंकार छोड़कर धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलना चाहिए।

भस्म का चौथा नाम- छार

भस्म का चौथा नाम “छार” कहा गया है। इसका अर्थ है संकटों और विपत्तियों का नाश करने वाली शक्ति। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक भस्म धारण करता है, उसके जीवन में आने वाली अनेक परेशानियां, रोग, दुख और बाधाएं कम हो जाती हैं। भगवान शिव की कृपा से कठिन परिस्थितियों का प्रभाव भी कम होने लगता है। इसलिए भस्म को सुरक्षा और संकट निवारण का प्रतीक माना गया है।

भस्म का पांचवां नाम- रक्षा

भस्म का पांचवां और अंतिम नाम “रक्षा” है। यह नाम स्वयं बताता है कि भस्म भक्त की रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति का प्रतीक है। शिव महापुराण के अनुसार भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि जो भी स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध या कोई भी जीव श्रद्धा के साथ उनके शरीर पर चढ़ी हुई भस्म को धारण करता है, उसकी रक्षा का भार स्वयं भगवान शिव उठाते हैं। ऐसी भस्म व्यक्ति को बुरी नजर, नकारात्मक प्रभावों और जीवन की अनेक बाधाओं से सुरक्षित रखने का माध्यम मानी जाती है।

आध्यात्मिक शक्ति और संरक्षण का प्रतीक 

भगवान शिव पर चढ़ी हुई भस्म केवल पूजा की सामग्री नहीं है, बल्कि वह शिव कृपा, वैराग्य, आध्यात्मिक शक्ति और संरक्षण का प्रतीक मानी जाती है। शिव महापुराण में वर्णित विभूति, भसित, भस्म, छार और रक्षा के पांच स्वरूप भस्म की महिमा को दर्शाते हैं। श्रद्धा और विश्वास के साथ धारण की गई भस्म भक्त को भगवान शिव के और अधिक निकट ले जाने का माध्यम बनती है तथा उसे सकारात्मकता, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक बल प्रदान करती है।

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