Religious Inspiration: भगवान अत्यंत दयालु हैं, लेकिन अपने भक्तों, संतों और धर्मपरायण व्यक्तियों के अपमान को वे कभी सहन नहीं करते। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को संतों, भक्तों और सज्जनों का सम्मान करना चाहिए।
Power of Devotion: आचार्य रामचंद्र दास जी महाराज अपने प्रवचनों में बताते हैं कि भगवान अत्यंत दयालु, करुणामय और भक्तवत्सल हैं। यदि कोई व्यक्ति अज्ञानवश भगवान का अपमान भी कर दे, तो भगवान अपनी करुणा के कारण उसे क्षमा कर सकते हैं। वे अपने ऊपर होने वाले अपमान को सहन कर लेते हैं, क्योंकि उनका स्वभाव प्रेम और दया से भरा हुआ है। लेकिन एक ऐसा अपराध है जिसे भगवान कभी सहन नहीं कर पाते, और वह है उनके भक्तों, संतों तथा हरिभक्तों का अपमान।
शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति भगवान के भक्तों का अपमान करता है, वह सीधे भगवान के क्रोध का भागी बनता है। भगवान अपने भक्तों से इतना प्रेम करते हैं कि उनके प्रति किया गया अनादर उन्हें स्वयं के अपमान से भी अधिक कष्ट देता है। इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा गया है कि जो अपराध भक्त के प्रति किया जाता है, वह भगवान के रोष रूपी अग्नि में जलकर नष्ट हो जाता है। ऐसे अपराधी को भगवान के प्रकोप से कोई नहीं बचा सकता।
भक्त केवल एक साधारण मनुष्य नहीं होता, बल्कि वह भगवान का प्रिय होता है। उसके हृदय में भगवान निवास करते हैं। इसलिए भक्त का अपमान वास्तव में भगवान के प्रेम और उनके निवास स्थान का अपमान माना जाता है।
रावण और विभीषण की घटना
इस सत्य को समझाने के लिए महाराज जी रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख करते हैं। जब रावण को बार-बार समझाने के बाद भी वह सत्य मार्ग पर नहीं आया, तब उसके छोटे भाई विभीषण ने उसे धर्म और नीति का उपदेश दिया। विभीषण ने रावण से कहा कि वह माता सीता को भगवान राम को लौटा दे और उनके चरणों में शरण ग्रहण करे, लेकिन अहंकार में डूबे हुए रावण ने अपने भाई की बात स्वीकार नहीं की। क्रोध में आकर उसने विभीषण का अपमान किया और उन्हें लात मार दी। उस समय भी विभीषण ने विनम्रता नहीं छोड़ी। वे बार-बार रावण के चरण पकड़कर उसे समझाने का प्रयास करते रहे। उनके मन में अपने भाई के प्रति द्वेष नहीं था, बल्कि उसका कल्याण करने की भावना थी।
भगवान राम का प्रकट हुआ रोष
आचार्य रामचंद्र दास जी महाराज बताते हैं कि जिस क्षण रावण ने विभीषण की छाती पर लात मारी, उसी क्षण भगवान राम का रोष प्रकट हो गया। भगवान अपने भक्त का अपमान सहन नहीं कर सके। कथा में भाव आता है कि भगवान राम धनुष उठाकर तुरंत चल पड़ने को तैयार हो गए। यह घटना दर्शाती है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। भक्त चाहे कहीं भी हो, भगवान उसकी पीड़ा को अपनी पीड़ा मानते हैं। भक्त पर हुआ अन्याय उन्हें तुरंत विचलित कर देता है।
लक्ष्मण जी ने भगवान को कराया स्मरण
जब भगवान राम क्रोध में आगे बढ़ने लगे, तब लक्ष्मण जी ने उनके चरण पकड़ लिए। उन्होंने भगवान को स्मरण कराया कि आपने पिता महाराज दशरथ को वचन दिया है कि चौदह वर्ष के वनवास के दौरान किसी नगर में प्रवेश नहीं करेंगे। उस समय लगभग साढ़े तेरह वर्ष बीत चुके थे और वनवास की अवधि पूरी होने में थोड़ा ही समय शेष था। लक्ष्मण जी ने विनती की कि आप अपने दिए हुए वचन का पालन करें। इस प्रकार उन्होंने भगवान के क्रोध को शांत किया और उन्हें उनके संकल्प की याद दिलाई।
विभीषण का अंतिम निर्णय
दूसरी ओर विभीषण ने यह समझ लिया कि अब लंका में उनका रहना उचित नहीं है। उन्होंने विचार किया कि जिस स्थान पर धर्म का अपमान हो रहा हो, जहां भगवान के नाम और सत्य की अवहेलना की जाती हो, वहां रहना व्यर्थ है। उन्होंने संकल्प किया कि अब वे भगवान श्रीराम की शरण में जाएंगे। विभीषण के मन में यह भाव था कि जिस रावण ने उनके हृदय में बसे भगवान राम के प्रिय भक्त होने का भी सम्मान नहीं किया और उन्हें लात मारकर अपमानित किया, उसके साथ रहना अब संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने लंका छोड़कर भगवान राम की शरण ग्रहण करने का निश्चय किया।
कैसे मिलती है भगवान की कृपा?
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान अत्यंत दयालु हैं, लेकिन अपने भक्तों, संतों और धर्मपरायण व्यक्तियों के अपमान को वे कभी सहन नहीं करते। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को संतों, भक्तों और सज्जनों का सम्मान करना चाहिए। जो व्यक्ति भक्तों का आदर करता है, वह भगवान की कृपा प्राप्त करता है, और जो उनका अपमान करता है, वह स्वयं अपने लिए दुःख और विनाश का मार्ग तैयार करता है। यही इस प्रसंग की सबसे बड़ी शिक्षा है।