विज्ञापन
Home  dharm  ramayana story tara ne kyo diya bhagvan ram ko shrap janiye kya tha vo shrap

Ramayana Story: तारा ने क्यों दिया भगवान राम को श्राप, जानिए क्या था वो श्राप

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Ramayana Story:  रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम से जुड़े कई किस्से कहानियां पढ़ने व सुनने को मिलते हैं. भगवान श्रीराम ने माता सीता और लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों तक वनवास काटा. वनवास के दौरान जब रावण ने सीता का अपहरण कर लिया था,

Ramayana Story:
Ramayana Story:  रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम से जुड़े कई किस्से कहानियां पढ़ने व सुनने को मिलते हैं. भगवान श्रीराम ने माता सीता और लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों तक वनवास काटा. वनवास के दौरान जब रावण ने सीता का अपहरण कर लिया था, तब प्रभु श्रीराम उनकी खोज में लगे थें. उस समय उनकी भेंट हनुमान जी, बाली, सुग्रीव से हुई थीं. इस दौरान एक अप्सरा ने भगवान श्रीराम को श्राप दिया था. कहते हैं कि इस श्राप के कारण ही माता सीता मिलने के बाद फिर से श्रीराम से अलगाव हो गई थी. जिसकी कथा इस प्रकार है.तारा, वानर राज बाली की पत्नी थीं, जो अपनी बुद्धिमत्ता, नीति-ज्ञान और पतिव्रता धर्म के लिए जानी जाती थीं। जब भगवान राम ने सुग्रीव की सहायता करने के लिए पेड़ की ओट से छिपकर बाली पर तीर चलाया, तो बाली मृत्युशैया पर आ गया। अपने पति को मरणासन्न देखकर तारा अत्यधिक शोक और क्रोध में डूब गईं।

बाली का वध

सुग्रीव और बाली के बीच चल रहे भयंकर युद्ध के दौरान, भगवान राम ने धर्म की स्थापना और सुग्रीव को दिए वचन को निभाने के लिए एक पेड़ के पीछे छिपकर बाली पर बाण चलाया। बाली अत्यंत शक्तिशाली था और उसे वरदान प्राप्त था कि जो भी उसके सामने युद्ध करेगा, उसका आधा बल बाली में समा जाएगा। इसलिए राम ने छिपकर प्रहार किया। जब बाली भूमि पर गिर पड़ा और अपनी अंतिम सांसें ले रहा था, तब तारा विलाप करती हुई युद्धभूमि में पहुंचीं। अपने अजेय पति को इस दशा में देखकर उनका हृदय छिन्न-भिन्न हो गया।

 तारा के क्रोध और श्राप का मुख्य कारण

तारा एक अत्यंत विदुषी और दूरदर्शी स्त्री थीं। उन्होंने बाली को सुग्रीव से युद्ध करने से मना भी किया था, क्योंकि उन्हें आभास था कि सुग्रीव को श्री राम का आश्रय प्राप्त है। लेकिन बाली के न मानने पर जो अनर्थ हुआ, उसने तारा को झकझोर दिया। तारा के श्राप देने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:

छिपकर वार करना: तारा का मानना था कि मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाने वाले श्री राम ने एक राजा होकर भी बाली पर छिपकर वार किया, जो युद्ध के नियमों और क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध था।
पति वियोग का असहनीय दुख: तारा अपने पति बाली से अगाध प्रेम करती थीं। बाली की मृत्यु ने उन्हें असहाय और एकाकी बना दिया। इस गहरे शोक ने उनके भीतर न्याय की मांग को क्रोध में बदल दिया।
सुग्रीव का पक्ष लेना: तारा को लगा कि राम ने केवल सुग्रीव की मित्रता के कारण बाली के साथ अन्याय किया, जबकि बाली ने राम का कोई अहित नहीं किया था।
 

तारा  ने भगवान राम को क्या श्राप दिया था 

प्रथम श्राप: सीता को पाकर भी वियोग का दुख

तारा  ने राम से कहा कि जिस तरह उन्होंने छिपकर बाली का वध किया है और उन्हें अपनी सर्वप्रिय वस्तु (पति) से अलग किया है, ठीक उसी तरह राम को भी अपनी सबसे प्रिय वस्तु का वियोग सहना होगा।उन्होंने श्राप दिया कि श्री राम अपनी पत्नी सीता को रावण के चंगुल से मुक्त तो करा लेंगे, लेकिन वे कभी भी लंबे समय तक सीता के साथ वैवाहिक सुख का आनंद नहीं ले पाएंगे। उन्हें सीता को पाकर भी दोबारा उनसे अलग होना पड़ेगा और समाज के लोक-अपवाद के कारण उनका त्याग करना पड़ेगा।

द्वितीय श्राप: अगले जन्म में मृत्यु का कारण

तारा ने राम को यह भी श्राप दिया कि जिस प्रकार उन्होंने कपट से, छिपकर उनके पति की जान ली है, उसी प्रकार अगले जन्म में उनकी मृत्यु भी इसी तरह एक साधारण ब्याध के हाथों छिपकर चलाए गए बाण से होगी।

4. श्राप का प्रभाव और त्रेता-द्वापर युग का अंत

भगवान राम, जो साक्षात विष्णु के अवतार थे, उन्होंने तारा के दुख को समझा और उनके श्राप को पूरी विनम्रता के साथ स्वीकार किया। इतिहास गवाह है कि तारा के दोनों श्राप अक्षरशः सत्य सिद्ध हुए:

सीता का त्याग:रावण का वध करने और लंका विजय के बाद, जब राम अयोध्या लौटे और राजा बने, तो एक धोबी के तानों के कारण उन्हें समाज की मर्यादा के लिए गर्भवती माता सीता का परित्याग करना पड़ा। राम को जीवनभर सीता के वियोग की अग्नि में जलना पड़ा।

कृष्ण अवतार में मृत्यु :द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया, तब उनके जीवन के अंतिम क्षणों में यह श्राप फलीभूत हुआ। श्री कृष्ण एक पेड़ के नीचे योग निद्रा में विश्राम कर रहे थे। उनके पैर का तलवा चमक रहा था, जिसे दूर से किसी हिरण की आंख समझकर 'जरा' नाम के एक शिकारी ने तीर चला दिया। वह जरा नामक शिकारी कोई और नहीं, बल्कि पूर्व जन्म का बाली ही था। इस प्रकार छिपकर चलाए गए बाण से ही श्री कृष्ण ने अपनी लीला समाप्त की।



 

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel