Ramayana Story: रामायण में भगवान श्रीराम और विभीषण का प्रसंग धर्म, शरणागति और अनन्य भक्ति का एक अद्भुत उदाहरण है। विभीषण, जो राक्षस राज रावण के छोटे भाई थे,
Ramayana Story: रामायण में भगवान श्रीराम और विभीषण का प्रसंग धर्म, शरणागति और अनन्य भक्ति का एक अद्भुत उदाहरण है। विभीषण, जो राक्षस राज रावण के छोटे भाई थे, जन्म से राक्षस कुल के होने के बाद भी सात्विक प्रवृत्ति, धर्म और भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहते थे। जब रावण ने माता सीता का हरण किया, तो विभीषण ने उसे बार-बार समझाया कि वह अधर्म का मार्ग छोड़कर सीता जी को श्रीराम को सौंप दे। परंतु, अहंकार में चूर रावण ने विभीषण की बात नहीं मानी और उन्हें लात मारकर लंका से निकाल दिया। इसके बाद विभीषण श्रीराम की शरण में आए। श्रीराम ने न केवल उन्हें गले लगाया, बल्कि अपनी शरणागत वत्सलता का परिचय देते हुए उन्हें कई महान वरदान दिए। भगवान राम द्वारा विभीषण को दिए गए वरदानों का विस्तृत वर्णन इस प्रकार है:
1. लंका का अचल साम्राज्य और राजतिलक
जब विभीषण रावण का त्याग कर समुद्र पार कर श्रीराम की सेना के शिविर में पहुंचे, तो सुग्रीव सहित कई वानर वीरों ने उन्हें शत्रु का गुप्तचर समझकर उन पर अविश्वास जताया। लेकिन श्रीराम ने कहा कि जो भी मेरी शरण में एक बार आ जाता है, मैं उसे कभी नहीं त्यागता।
विभीषण के शरण में आते ही, श्रीराम ने लक्ष्मण जी से समुद्र का जल लाने को कहा। अभी युद्ध शुरू भी नहीं हुआ था और रावण जीवित था, लेकिन श्रीराम ने विभीषण की भक्ति और सत्य पर विश्वास करते हुए युद्ध से पहले ही विभीषण का लंका के राजा के रूप में राजतिलक कर दिया। श्रीराम ने वरदान दिया कि जब तक इस पृथ्वी पर सूर्य और चंद्रमा रहेंगे, तब तक लंका पर विभीषण और उनके वंश का राज रहेगा। इसे 'अचल राज्य' का वरदान कहा जाता है।
2. अमरत्व का वरदान (चिरंजीवी होने का आशीष)
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, पृथ्वी पर सात (या आठ) महापुरुषों को दीर्घायु या अमरत्व का वरदान प्राप्त है, जिन्हें 'चिरंजीवी' कहा जाता है। विभीषण उन्हीं में से एक हैं। श्रीराम ने विभीषण की धर्मनिष्ठा को देखकर उन्हें चिरंजीवी होने का वरदान दिया।
श्रीराम ने कहा कि कलयुग के अंत तक विभीषण जीवित रहेंगे और पृथ्वी पर धर्म का प्रचार-प्रसार करेंगे। आज भी माना जाता है कि विभीषण अपने सूक्ष्म रूप में इस पृथ्वी पर मौजूद हैं।
3. अचल और अनन्य भक्ति का वरदान
विभीषण ने श्रीराम से कभी भी धन, संपत्ति या लंका का राज्य नहीं मांगा था। उनका मुख्य उद्देश्य केवल भगवान के चरणों की प्राप्ति था। जब श्रीराम ने उन्हें लंका का राजा बनाया, तब भी विभीषण के मन में कोई लोभ नहीं था।उनकी इस निष्काम भावना को देखकर श्रीराम ने उन्हें अपनी अचल और निष्कपट भक्ति का वरदान दिया। श्रीराम ने कहा कि विभीषण का मन कभी भी अधर्म की ओर नहीं जाएगा और उनकी बुद्धि सदैव भगवान के चरणों में लगी रहेगी। इस वरदान के कारण विभीषण को 'भक्त शिरोमणि' का स्थान मिला।