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Dhumavanti Jayanti : धूमावती जयंती क्यों मनाई जाती है, जानिए कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Dhumavanti Jayanti :  मां धूमावती सनातन धर्म और विशेष रूप से तंत्र शास्त्र में एक अत्यंत विशिष्ट और रहस्यमयी देवी हैं। वे भगवान शिव द्वारा प्रकट की गईं दस महाविद्याओं में से सातवीं महाविद्या हैं। 

Dhumavanti Jayanti
Dhumavanti Jayanti :  मां धूमावती सनातन धर्म और विशेष रूप से तंत्र शास्त्र में एक अत्यंत विशिष्ट और रहस्यमयी देवी हैं। वे भगवान शिव द्वारा प्रकट की गईं दस महाविद्याओं में से सातवीं महाविद्या हैं। हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को धूमावती जयंती के रूप में मनाया जाता है।जहां एक ओर माँ लक्ष्मी, माँ दुर्गा या माँ सरस्वती सौंदर्य, ऐश्वर्य, ममता और सृजन का प्रतीक हैं; वहीं माँ धूमावती का स्वरूप इसके बिल्कुल विपरीत वैराग्य, शोक, दरिद्रता, शून्यता और संसार की नश्वरता को दर्शाता है। वे पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र ऐसी देवी हैं जिन्हें 'विधवा स्वरूप' में पूजा जाता है। चलिए आपको बताते हैं कि धूमावती जयंती क्यों मनाई जाती है 

पौराणिक कथाएँ 


प्रथम कथा: भगवान शिव को निगलने का प्रसंग

एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती और भगवान शिव कैलाश पर्वत पर बैठे थे। अचानक माता पार्वती को तीव्र भूख लगी। उन्होंने महादेव से भोजन की व्यवस्था करने का अनुरोध किया। भगवान शिव ने कहा कि वे शीघ्र ही भोजन का प्रबंध करते हैं, परंतु काफी समय बीत जाने के बाद भी भोजन की व्यवस्था नहीं हो पाई।भूख की तीव्रता इतनी बढ़ गई कि माता पार्वती का संयम टूट गया। अपनी भूख शांत करने के लिए उन्होंने सामने बैठे भगवान शिव को ही निगल लिया। शिवजी के गले में हलाहल विष होने के कारण और उनकी ब्रह्मांडीय ऊर्जा की वजह से माता पार्वती के शरीर से तीव्र और भयानक धुआं निकलने लगा। जब माता पार्वती का क्रोध और भूख शांत हुई, तब महादेव उनके शरीर से बाहर आए। उन्होंने देवी से कहा, *"प्रिये, तुमने भूख के वशीभूत होकर अपने ही पति का भक्षण कर लिया, इसलिए अब तुम पुरुषशून्या यानी विधवा स्वरूप में रहोगी।" धुएं से प्रकट होने और महादेव के इस श्राप के कारण उनका नाम 'धूमावती' पड़ा।

 द्वितीय कथा: माता सती का आत्मदाह

एक अन्य कथा के अनुसार, जब राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया और उसमें भगवान शिव का अपमान किया, तब माता सती ने क्रोध और ग्लानि में आकर यज्ञ की पवित्र अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया। जब उनका भौतिक शरीर जल रहा था, तब उस जलती हुई देह से जो भयंकर धुआं निकला, उसी धुएं (धूम) से माँ धूमावती का प्राकट्य हुआ। यह स्वरूप सती के उस परम शोक, असंतोष और वैराग्य की साक्षात प्रतिमूर्ति है जो उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में अनुभव किया था।

 माँ धूमावती का स्वरूप 

माँ धूमावती का प्रतिमा-विज्ञान  सामान्य देवियों जैसा सुंदर या आभूषणों से सुसज्जित नहीं है, बल्कि यह जीवन के कड़वे सत्यों को दर्शाता है:

वेषभूषा: वे अत्यंत वृद्ध, दुबली-पतली और मलिन सफेद वस्त्र धारण किए हुए हैं। उनके बाल बिखरे और रूखे हैं।

वाहन:उनका वाहन कौआ  है, जो सनातन परंपरा में मृत्यु, पितरों और अशुभता का प्रतीक माना जाता है।

हाथों में आयुध: वे एक हाथ में सूप  धारण करती हैं और दूसरा हाथ वरदान मुद्रा में होता है। वे एक रथ पर सवार हैं जिसमें कोई घोड़ा नहीं जुता है 

सूप का प्रतीकवाद: माँ धूमावती के हाथ में मौजूद सूप हमें यह सिखाता है कि जिस तरह सूप कचरे को बाहर फेंक देता है और शुद्ध अनाज को अंदर रख लेता है, उसी तरह मनुष्य को अपने जीवन से नकारात्मकता, अज्ञान और भ्रम को निकालकर केवल सत्य और ज्ञान को अपनाना चाहिए।

 धूमावती जयंती क्यों मनाई जाती है? 

जीवन के दुखों और संकटों से मुक्ति

इन्हें अलक्ष्मी या दुर्भाग्य की देवी भी कहा जाता है, लेकिन तंत्र शास्त्र के अनुसार, जो साधक इस दिन माँ धूमावती की शरण में जाता है, माँ उसके जीवन से दरिद्रता, रोग, कर्ज और कंगाली को हमेशा के लिए समेट लेती हैं। वे स्वयं अभाव रूप हैं, इसलिए वे अपने भक्तों को कभी अभाव में नहीं रहने देतीं।

शत्रुओं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश

धूमावती जयंती के दिन की गई साधना से गुप्त शत्रुओं, कोर्ट-कचहरी के विवादों, तंत्र-मंत्र के बुरे प्रभावों और ऊपरी बाधाओं से मुक्ति मिलती है। ऋषि दुर्वासा, भृगु और परशुराम जैसे परम क्रोधी और शक्तिशाली ऋषियों की मूल शक्ति माँ धूमावती को ही माना गया है।

वैराग्य और मोक्ष की प्राप्ति
यह दिन भौतिक सुखों की कामना से अधिक  आध्यात्मिक उच्चता प्राप्त करने का है। माँ धूमावती संसार की नश्वरता का साक्षात प्रतीक हैं। वे याद दिलाती हैं कि यह शरीर, धन और वैभव सब एक दिन धुएं की तरह उड़ जाएगा। इस सत्य को स्वीकार करने से साधक के भीतर सच्चा वैराग्य और विवेक जागृत होता है, जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)


 

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