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Bhagvan Vishnu: भगवान विष्णु शेषनाग पर क्यों विराजते हैं जानिए सही वजह

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Bhagvan Vishnu: सनातन धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता माना जाता है। मंदिरों और चित्रों में अक्सर उन्हें क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर विश्राम करते हुए दिखाया जाता है।

Bhagvan Vishnu
Bhagvan Vishnu: सनातन धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता माना जाता है। मंदिरों और चित्रों में अक्सर उन्हें क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर विश्राम करते हुए दिखाया जाता है। बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न आता है कि भगवान विष्णु किसी साधारण आसन पर न बैठकर शेषनाग पर ही क्यों विराजते हैं। इसके पीछे धार्मिक, आध्यात्मिक अर्थ बताए गए हैं।

शेषनाग कौन है ?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि शेषनाग कोई साधारण सर्प नहीं हैं। उन्हें अनंत भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है जिसका कोई अंत न हो। पौराणिक मान्यता के अनुसार शेषनाग के हजार फन हैं और वे अत्यंत शक्तिशाली तथा दिव्य हैं। कहा जाता है कि वे अपने फनों पर पृथ्वी को धारण किए हुए हैं। उनका 
नाम "शेष" इसलिए पड़ा क्योंकि प्रलय के बाद जब सब कुछ समाप्त हो जाता है, तब भी जो शेष रहता है, वही शेषनाग हैं।

शेषनाग पर क्यों विराजते है भगवान विष्णु धार्मिक महत्व 

धार्मिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा की अवस्था में रहते हैं और शेषनाग उनकी शैया बनते हैं। यह दृश्य हमें यह संदेश देता है कि सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु हर परिस्थिति में शांत और संतुलित रहते हैं। चाहे संसार में कितनी भी हलचल क्यों न हो, उनका मन स्थिर रहता है। शेषनाग पर विराजने का एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ भी है। सामान्य रूप से सर्प को भय, क्रोध और विनाश का प्रतीक माना जाता है। लेकिन भगवान विष्णु उसी सर्प को अपने आसन के रूप में धारण करते हैं। इसका अर्थ है कि जिसने अपने भय, क्रोध और नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण पा लिया, वही सच्चे अर्थों में दिव्यता को प्राप्त कर सकता है। भगवान विष्णु हमें सिखाते हैं कि जीवन की कठिनाइयों और भय पर विजय पाकर ही शांति मिलती है।

शेषनाग पर क्यों विराजते है भगवान विष्णु का आध्यात्मिक महत्व 


शेषनाग के अनेक फनों का भी विशेष महत्व है। माना जाता है कि उनके हजार फन अनंत ज्ञान और अनंत शक्ति के प्रतीक हैं। भगवान विष्णु उस ज्ञान और शक्ति के ऊपर विराजमान होकर यह दर्शाते हैं कि परम सत्य सभी शक्तियों का स्वामी है। संसार में जितना भी ज्ञान, समय और ऊर्जा है, वह सब ईश्वर के अधीन है। एक मान्यता यह भी है कि शेषनाग समय का प्रतीक हैं। समय निरंतर चलता रहता है और कभी रुकता नहीं। भगवान विष्णु का समय के ऊपर विराजमान होना यह बताता है कि ईश्वर काल से भी परे हैं। वे भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को जानते हैं। इसलिए उन्हें त्रिकालदर्शी भी कहा जाता है।भगवान विष्णु और शेषनाग का संबंध केवल क्षीरसागर तक ही सीमित नहीं है। जब भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर अवतार लिए, तब शेषनाग भी उनके साथ अवतरित हुए। लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार माना जाता है, जिन्होंने भगवान श्रीराम की सेवा की। इसी प्रकार बलराम को भी शेषनाग का अवतार माना जाता है, जिन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई के रूप में जन्म लिया। इससे यह संदेश मिलता है कि शेषनाग सदैव भगवान विष्णु के साथ रहकर उनकी सेवा करते हैं।एक अन्य आध्यात्मिक व्याख्या के अनुसार शेषनाग भक्ति और समर्पण के प्रतीक हैं। वे अपनी संपूर्ण शक्ति भगवान विष्णु की सेवा में समर्पित कर देते हैं। यह हमें सिखाता है कि यदि मनुष्य अहंकार छोड़कर अपने कर्तव्य और ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाए, तो उसका जीवन सफल हो सकता है।

क्षीरसागर का महत्व 

समुद्र को असीम चेतना और गहराई का प्रतीक माना जाता है। उसके ऊपर शेषनाग और उन पर विराजमान भगवान विष्णु यह बताते हैं कि सृष्टि का संचालन पूर्ण संतुलन, धैर्य और व्यवस्था से होता है। माता लक्ष्मी का भगवान विष्णु के चरणों के पास बैठना समृद्धि और सेवा भाव का प्रतीक माना जाता है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि जहां धैर्य, संतुलन और धर्म होता है, वहां सुख और समृद्धि भी निवास करती है। कुछ विद्वान शेषनाग को प्रकृति की असीम ऊर्जा का प्रतीक भी मानते हैं। सर्प अपनी कुंडली बनाकर बैठता है, जिसे छिपी हुई शक्ति का रूप माना जाता है। भगवान विष्णु का उस शक्ति पर नियंत्रण यह दर्शाता है कि सृष्टि की सभी शक्तियां परमात्मा के नियमों के अनुसार कार्य करती हैं। 
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)



 

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