Adhik Masik Shivratri: सनातन धर्म में मासिक शिवरात्रि का विशेष महत्व माना गया है। प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि का व्रत रखा जाता है, लेकिन जब अधिक मास आता है तो उस दौरान पड़ने वाली मासिक शिवरात्रि का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है तथा श्रद्धालु दिनभर उपवास रखकर रात्रि जागरण और शिव आराधना करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक मासिक शिवरात्रि का व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने, पापों के क्षय तथा मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। हालांकि, व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण विधिपूर्वक और शास्त्रीय नियमों के अनुसार किया जाए। आइए जानते हैं अधिक मासिक शिवरात्रि व्रत के पारण की सही विधि, आवश्यक नियम और इसका धार्मिक महत्व।
अधिक मासिक शिवरात्रि व्रत का महत्व
अधिक मास को सनातन धर्म में अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है, लेकिन इस दौरान भगवान शिव की उपासना का भी विशेष फल बताया गया है। अधिक मासिक शिवरात्रि पर किया गया व्रत साधक को विशेष आध्यात्मिक पुण्य प्रदान करता है।
शिव पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की आराधना करने से जीवन के अनेक कष्ट दूर होते हैं। अधिक मास में आने वाली शिवरात्रि पर व्रत, जप, तप और दान का फल सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक माना जाता है। इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और भांग अर्पित कर भगवान शिव को प्रसन्न किया जाता है।
कब किया जाता है व्रत का पारण?
अधिक मासिक शिवरात्रि का व्रत चतुर्दशी तिथि में रखा जाता है और इसका पारण अगले दिन प्रातःकाल किया जाता है। पारण का समय स्थानीय पंचांग और तिथि के अनुसार निर्धारित किया जाता है। सामान्यतः चतुर्दशी तिथि समाप्त होने के बाद और सूर्योदय के पश्चात व्रत का पारण करना शुभ माना जाता है। धार्मिक नियमों के अनुसार रात्रि में शिवरात्रि पूजन और जागरण के बाद अगले दिन स्नान एवं पूजा के उपरांत ही अन्न ग्रहण करना चाहिए। तिथि समाप्त होने से पहले पारण नहीं करना चाहिए।
व्रत पारण की संपूर्ण विधि
अधिक मासिक शिवरात्रि व्रत का पारण करने से पहले प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में जागना चाहिए। इसके बाद स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शिव का स्मरण करें। इसके पश्चात घर के मंदिर या शिवालय में जाकर भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करें। शिवलिंग पर जल अर्पित करें और पूजा के दौरान "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करें।
पूजन पूर्ण होने के बाद भगवान शिव से व्रत में हुई किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा याचना करें। इसके बाद प्रसाद ग्रहण करें। पारण की शुरुआत सामान्यतः जल, फल या सात्विक प्रसाद से की जाती है। इसके बाद आवश्यकता अनुसार सात्विक भोजन ग्रहण किया जा सकता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार पारण से पहले ब्राह्मण, साधु अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को दान देना भी शुभ माना जाता है। श्रद्धा के अनुसार अन्न, वस्त्र, फल या दक्षिणा का दान किया जा सकता है।
व्रत पारण के दौरान किन नियमों का पालन करें?
अधिक मासिक शिवरात्रि व्रत का पारण करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना आवश्यक माना गया है। सबसे पहले पारण निर्धारित समय पर ही करना चाहिए। बिना तिथि विचार के किया गया पारण व्रत के पूर्ण फल में बाधा माना जाता है। पारण से पहले भगवान शिव का पूजन अवश्य करें। केवल भोजन कर लेने को पारण नहीं माना जाता, बल्कि पूजा और संकल्प पूर्ण करने के बाद ही व्रत समाप्त माना जाता है।
व्रत के पारण में सात्विक भोजन का ही सेवन करना चाहिए। तामसिक भोजन, मदिरा या मांसाहार से दूर रहना चाहिए। पारण के दिन क्रोध, विवाद और असत्य भाषण से बचने का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि व्रत की पवित्रता बनाए रखने के लिए संयमित आचरण आवश्यक होता है।
रात्रि जागरण का महत्व
अधिक मासिक शिवरात्रि के व्रत में रात्रि जागरण को विशेष महत्व दिया गया है। श्रद्धालु पूरी रात भगवान शिव के भजन, कीर्तन, मंत्र जप और शिव कथा का श्रवण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवरात्रि की रात्रि में जागकर भगवान शिव का स्मरण करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। कई भक्त रात्रि के चारों प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक भी करते हैं। इस दौरान जल, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से भगवान शिव का पूजन किया जाता है।
पारण से पहले किए जाने वाले दान-पुण्य
अधिक मासिक शिवरात्रि के अवसर पर दान का भी विशेष महत्व माना गया है। व्रत पूर्ण होने पर श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अन्नदान, वस्त्रदान, जलदान तथा गौसेवा का विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
इसके अतिरिक्त भगवान शिव को प्रिय वस्तुओं जैसे बेलपत्र, सफेद वस्त्र या चंदन का दान भी शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन शिव मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना के साथ दान-पुण्य के कार्य भी करते हैं, जिससे व्रत का धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
अधिक मासिक शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा का महत्व